
प्रशासन के पास हर हफ्ते पहुंच रहे हैं एक दर्जन से ज्यादा मामले
इंदौर। शहर (Indore) के तेज विकास और चमक-दमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी सामने आ रही है। जिन माता-पिता (Parents) ने अपने बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया, आज वही बुजुर्ग (Elderly) अपने ही बच्चों से भरण-पोषण की गुहार लगाने को मजबूर हैं। मध्यस्थता केंद्र में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। हर हफ्ते एक दर्जन से ज्यादा माता-पिता न्याय की गुहार लेकर पहुंच रहे है। अपने ही परिवार में बुजुर्गों को सम्मान और सहारा नहीं, बल्कि उपेक्षा और संघर्ष मिल रहा है। अब तक 425 से अधिक आवेदन सामने आ चुके हैं।
सिसोदिया परिवार के बुजुर्ग दंपति ने अपनी बहू पर ही आरोप लगाए हैं कि जिस बहू को उन्होंने पढ़ा-लिखा कर बड़ी डिग्री दिलाई, आज वही उनका भरण-पोषण तक करने को तैयार नहीं है। बहू सोमवती की शिकायत करते हुए सास-ससुर ने आरोप लगाया कि बहू मकान पर कब्जा करना चाहती है और पोता उनके साथ मारपीट करता है। वे दूसरी बार जनसुनवाई में आए। पहले उन्हें अलग-अलग कमरों में भेजा गया, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ। इसी तरह एक अन्य बुजुर्ग दंपति भी कलेक्टर से अपने बेटे की शिकायत करने पहुंचे और बताया कि वह दवाई तक के लिए खर्च नहीं दे रहा। दोनों ही दंपतियों की समस्या सुन तुरंत एसडीएम जूनी इंदौर को कलेक्टर ने निराकरण करने के निर्देश दिए हैं।
425 बुजुर्गों ने मांगा अपने हक का सहारा
अब तक करीब 425 मामलों में माता-पिता को अपने ही बच्चों के खिलाफ भरण-पोषण के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन देना पड़ा है। यह स्थिति न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी भी है कि पारिवारिक मूल्य किस तेजी से कमजोर हो रहे हैं। इंदौर में ही यह आंकड़ा दर्शाता है कि जिन माता-पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, बच्चे उन्हें ही वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा रहे हैं। इन आंकड़ों में मध्यवर्ग परिवारों के साथ-साथ हाई क्लास सोसाइटियों के मामले भी बहुतायत में है।ं मध्यस्थता केंद्र के सदस्य अभिषेक मित्तल के अनुसार भरण-पोषण से संबंधित मामलों में बुजुर्गों के साथ हो रहे अत्याचार, अपमान, आर्थिक शोषण, मारपीट के साथ मानसिक व शारीरिक अत्याचार बेटे और बहू द्वारा सबसे अधिक किया जाना सामने आ रहा है।
रिश्तों पर भारी पड़ रही विकास की मार
इंदौर में बदलती जीवनशैली और बढ़ती व्यस्तता ने पारिवारिक रिश्तों को भी प्रभावित किया है। माता-पिता के भरण-पोषण से जुड़े मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। प्रशासन के पास बड़ी संख्या में आवेदन पहुंच रहे हैं, जो समाज के बदलते चेहरे को उजागर करते हैं। यदि आंकड़ों पर नजर दलाई जाए तो सबसे ज्यादा मामले मल्हारगंज और जूनी इंदौर क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। यहां लगभग दो-दो दर्जन से अधिक मामलों पर सुनवाई चल रही है।
मध्यस्थता बनी सहारा, वरना बढ़ते विवाद
जिला प्रशासन के निर्देश पर गठित सामुदायिक मध्यस्थता दल इन मामलों में उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है। अपर कलेक्टर रोशन राय के नेतृत्व में टीम दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाकर समझाइश दे रही है और रिश्तों को टूटने से बचाने का प्रयास कर रही है। हालांकि उनका कहना है कि कई मामलों में समझौते होने के बाद दोबारा विवाद की स्थिति निर्मित हो जाती है और फिर वही आवेदन बढ़ने लगते हैं। केंद्र में जून 2024 से अप्रैल 2026 तक कुल 1450 प्रकरण सामने आए, जिनमें से 1410 मामलों का निराकरण किया जा चुका है। हालांकि 40 मामले अब भी लंबित हैं। इन आंकड़ों में बड़ी हिस्सेदारी माता-पिता के भरण-पोषण से जुड़े विवादों की है।
समाज के लिए चेतावनी
प्रशासन द्वारा समझाइश देकर अधिकतर मामलों में समझौता कराया जा रहा है, लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी है, जो माता-पिता को अपने ही बच्चों के खिलाफ खड़ा होने पर मजबूर कर रही है। यह सिर्फ प्रशासनिक आंकड़े नहीं, बल्कि समाज के लिए आईना हैं। जनसुनवाई में कलेक्टर के समक्ष मुंबई ,पुणे जैसी विकसित सीटियों से कई बुजुर्ग माता-पिता आश्रम की तलाश में इंदौर पहुंचे, जिन्हें कलेक्टर ने वृद्धाश्रम में तो प्रवेश दिला दिया, लेकिन इन घटनाओं ने आने वाले समय में इंदौर की भी तस्वीर साफ कर दी कि अब संवेदनशील नहीं बरती गई तो यह समस्या हमारे शहर में भी और गंभीर रूप ले सकती है।
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