
अदालत में अंधा कानून तो जेल में गंदा कानून…दो साध्वियों की अस्मत से खेलने वाला और एक पत्रकार की जान लेने वाला…राम और रहीम दोनों को बदनाम करने वाला… डेरा सच्चा सौदा के नाम से धर्म, समाज और संस्कृति को गंदा करने वाला गुरमीतसिंह उर्फ राम रहीम बड़ी मशक्कत के बाद तमाम सबूतों और गवाहों की बुनियाद पर दो साध्वियों से बलात्कार के जुर्म में 20 साल और एक पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति के कत्ल में उम्रकैद की साज पाने के बाद अपने रसूख और राजनीतिक दबदबे के चलते पैरोल और फरलो के नाम पर हर साल 91 दिन यानी तीन माह जेल से छूटकर अपने सिरसा स्थित पाप के अड्डे पर ऐशो-आराम और अय्याशी करता है… उसे जेल से लेने जहां उसके सैकड़ों गुर्गे जाते हैं, वहीं पंजाब और हरियाणा दो राज्यों की पुलिस भी उसे उसके अड्डे तक छोडऩे जाती है… जिस संविधान की हम पूजा करते हैं… जिस वंदे मातरम के गान में शान समझते हैं… जिस जन-गण-मन को अधिनायक कहते हैं, उस देश में बलात्कारी और कातिल कानून के दायरे में अय्याशी करते हैं… अदालत का सजायाफ्ता, समाज और इंसानियत का गुनहगार गुरमीत 2017 में गिरफ्तार होने के बाद से 2021 तक केवल दो दिन के लिए पैरोल पा सका, लेकिन उसके बाद हुए चुनाव से पहले सत्ताधारी राजनीतिक दल से समझौते के बाद हर साल जेल के कानून से मिलने वाली पैरोल के 70 दिन और फरलो के 21 दिन, यानी कुल 91 दिन जेल से बाहर आता है और यह रिहाई हर तीसरे महीने होती है… रिहाई के अलावा उसे जेल में हर वो सुख-सुविधा मिलती है, जो उसके पाप के अड्डे, यानी डेरे में रहती है… राम रहीम नाम के इस अपराधी पर सरकार की इस लगातार मेहरबानी पर न कोई विरोधी दल उंगली उठाता है और न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता आंदोलन करने जाता है, और न ही कानून के इस खिलवाड़ पर अदालत का जमीर जागता है…जबकि अखबारों में गुरमीत की पैरोल पर हर बार सवाल उठाया जाता है, क्योंकि पैरोल कैदियों को केवल परिवार के किसी सदस्य की बीमारी, मौत या विवाह पर ही दी जाती है…जबकि गुरमीत के घर में न कोई मरता है, न कोई बीमार पड़ता है और न ही कोई विवाह होता है… लेकिन वो हर साल पैरोल के 70 दिनों का लाभ लेकर बाहर आता है… वहीं फरलो अच्छे आचरण के लिए दी जाती है, जबकि गुरमीत तो बलात्कारी है… उससे अच्छे आचरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है… लेकिन वह फरलो की अधिकमत अवधि, यानी हर साल 21 दिनों के लिए इस गंदे कानून की वजह से अय्याशी करने समाज में आता है… जबकि जेल के सामान्य कैदी साल में एक बार भी बाहर नहीं आ पाते हैं…घुट-घुटकर मर जाते हैं…सजा खत्म होने पर अर्थदंड नहीं चुका पाने से कैद होकर रह जाते हैं… उनके लिए कानून हमदर्दी नहीं दिखाता… कोई जेलर उनकी पीड़ा नहीं समझ पाता, क्योंकि वह वोट बैंक नहीं होता… किसी नेता का भला नहीं कर सकता… इस सच पर भी उंगली नहीं उठा सकता कि अदालत में अंधा कानून होता है और जेल में कानून का खून…
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