नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव (West Asia tensions) और वैश्विक ऊर्जा संकट (Global Energy Crisis) का असर अब सीधे आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। पेट्रोल-डीजल की महंगाई से जूझ रहे उपभोक्ताओं को अब खाद्य तेलों (Edible oils.) की बढ़ती कीमतों ने भी परेशान करना शुरू कर दिया है। फरवरी 2026 से अब तक विभिन्न खाद्य तेलों की थोक कीमतों में करीब 13 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में शिपिंग, बीमा और ट्रांजिट लागत तेजी से बढ़ी है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है।
Rahul Chauhan के मुताबिक, युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता के चलते पाम तेल समेत कई खाद्य तेलों का आयात महंगा हो गया है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भी आयात लागत को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल बाजार में थोड़ी मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है, लेकिन लंबी अवधि में कीमतों में तेजी बनी रहने की संभावना ज्यादा है।
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन में किसी भी तरह की बाधा, समुद्री मालभाड़ा बढ़ने या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले Russo-Ukrainian War के कारण सूरजमुखी तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी और अब ईरान से जुड़े तनाव ने वनस्पति तेल बाजार में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है।
खाद्य तेलों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नमकीन, बिस्कुट, बेकरी उत्पाद, फ्रोजन फूड और रेडी-टू-ईट सामान बनाने में होता है। ऐसे में तेल महंगा होने से एफएमसीजी कंपनियों की उत्पादन लागत भी बढ़ गई है।
Modi Naturals Limited के प्रबंध निदेशक अक्षय मोदी का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ खाद्य तेलों तक सीमित नहीं है। इससे पैकेजिंग, प्लास्टिक और पेपर की लागत भी बढ़ रही है, जो एफएमसीजी कंपनियों के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा होती हैं।
उद्योग जगत का मानना है कि लगातार बढ़ती इनपुट लागत का असर आने वाले समय में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। कंपनियां नमकीन, बिस्कुट और अन्य पैकेज्ड फूड उत्पादों के दाम बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है और ऊर्जा कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो किसानों की लागत, परिवहन खर्च और खाद्य उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। इसका असर आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई के रूप में और ज्यादा महसूस किया जा सकता है।
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