
इंदौर। होलकरकाल में मोहर्रम के अवसर पर अस्थायी इमामबाड़ा राजबाड़े के मुख्य द्वार के समीप था। कर्बला तक निकलने वाले ताजिया जुलूस की अगुआई ख़ुद होलकर महाराजा हाथी पर सवार होकर किया करते थे। होलकर राजाओं में इमाम हुसैन के लिए कुछ अलग ही अकीदत और श्रद्धा थी। प्राचीन समय में राजबाड़ा महल के डेवढ़ी के पास ताजिया बनता था।
ताजिया बनाने वाले कारीगरों के लिए महल के डेवढ़ी के पास तंबू बनवाए जाते थे, ताकि वे आराम से इस काम को पूरा कर सकें। उस समय भी सरकारी ताजिया बड़ी धूमधाम से निकाला जाता था। इंदौर में राजबाड़ा बन जाने के बाद पिछले हिस्से में नए इमामबाड़े से सरकारी ताजिया निकलने लगा। इंदौर का सरकारी ताजिया देश की आजादी के पूर्व तक 7 खंडों (मंजिल) का होता था और इसकी ऊंचाई 55 फीट होती थी। खासगी ट्रस्ट से इसके निर्माण का खर्च मिलता था। सरकारी ताजिया उठाने से इसे 100 व्यक्ति लगते थे।
राजा निकलते थे ताजिए के नीचे से
कहा जाता है कि ताजिए के नीचे से निकलने से मन्नतें पूरी होती हैं, इसलिए होलकर राजघराने के लोग भी ताजिए के नीचे से निकलते थे।
महाराजा स्वयं सैली पहनते थे तथा फातिहा पढ़वाते थे
इंदौर में बड़े ताजिए को साधने और संभालने के लिए रस्सियां बांधी जाती थीं। महाराजा स्वयं आते थे, सैली पहनते थे तथा फातिहा पढ़वाते थे। वे हाथी पर बैठकर कर्बला तक जाते थे। ताजिए के साथ अखाड़े और दूसरे सरकारी ओहदेदार जाते थे। पहले इस ताजिए को ख्वाजाबख्श बनाते थे। उसके बाद उनके पुत्र यासिन बाबा और अब अन्य पीढिय़ों द्वारा सरकारी ताजिए का निर्माण इमामबाड़े में किया जाता है।
किला भवन में होलकर फौज का ताजिया बनता था
इंदौर में दूसरा प्रमुख ताजिया होलकर फौज का उठता था। इसका निर्माण किले में (जहां आजकल कन्या महाविद्यालय है) होता था। यह ताजिया सरकारी ताजिए की तुलना में कम ऊंचा होता था, अर्थात 40 फीट ऊंचा। इसका अधिकांश भाग ताडिय़ों का बना होता था। इस ताजिए के साथ फौज के सैनिक व अधिकारी कर्बला तक जाते थे। सरकारी सैनिकों की टुकडिय़ों द्वारा ताजि़ए को सलामी दी जाती थी।
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