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अवैध संबंध के आरोप में जवान की बर्खास्तगी रद्द, HC ने विभाग को फटकारा

July 08, 2026

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) के कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने विभाग की ओर से जारी बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए इसे अवैध और मनमाना करार दिया. कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों के आधार पर दंडित किया जा सकता है, जो विभागीय चार्जशीट में शामिल हों. ऐसे आरोपों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, जो चार्जशीट का हिस्सा ही न रहे हों.

मामले की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई थी, जब एक शादीशुदा महिला ने कांस्टेबल भरत पाठक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. महिला का आरोप था कि दोनों पहले से विवाहित होने और बच्चों के माता-पिता होने के बावजूद भरत पाठक ने उससे कथित तौर पर शादी की और अक्टूबर 2019 से अप्रैल 2023 के बीच शारीरिक संबंध बनाए. बाद में आरोपी ने उसे अपने साथ रखने से इनकार कर दिया. शिकायत के बाद विभाग ने भरत पाठक के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की. साथ ही एफआईआर भी दर्ज हुई. इसके बाद उन्हें पहले निलंबित किया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया.


  • मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने विभागीय कार्रवाई की वैधता की विस्तार से समीक्षा की. कोर्ट ने पाया कि विभागीय चार्जशीट में भरत पाठक पर केवल एक शादीशुदा महिला से संबंध रखने और अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया था. हालांकि, अंतिम बर्खास्तगी आदेश में रेप की एफआईआर को आधार बनाया गया, जबकि यह आरोप विभागीय चार्जशीट का हिस्सा नहीं था. अदालत ने कहा कि सेवा नियमों के तहत किसी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों पर दंडित किया जा सकता है, जिनकी जानकारी उसे चार्जशीट के माध्यम से दी गई हो. इसलिए बर्खास्तगी की पूरी प्रक्रिया कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं थी.

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता महिला के बयानों के अलावा कोई ठोस दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया. कथित शादी का कोई प्रमाण, होटल की सीसीटीवी फुटेज या दोनों के साथ रहने से जुड़े किसी किराये के मकान का दस्तावेज अदालत के समक्ष पेश नहीं किया गया. याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि विभाग ने जिस आधार पर बर्खास्तगी का आदेश दिया, वह विभागीय चार्जशीट में शामिल ही नहीं था. कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया.

    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ’ फैसले का भी जिक्र किया. अदालत ने कहा कि इस निर्णय के बाद व्यभिचार (Adultery) अब आपराधिक अपराध नहीं है. ऐसे में केवल इस आधार पर कठोर विभागीय कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता.

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