
जबलपुर। मध्यप्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती है, लेकिन जब उसी नीति की असली परीक्षा आती है तो सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली कई सवाल खड़े कर देती है। जबलपुर लोकायुक्त द्वारा रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए अनेक अधिकारी और कर्मचारी आज भी अदालत तक नहीं पहुंच पाए हैं। वजह अभियोजन स्वीकृतिलोकायुक्त की जांच पूरी होने और पर्याप्त साक्ष्य जुटाए जाने के बाद भी 38 गंभीर भ्रष्टाचार मामलों में संबंधित विभागों से अभियोजन स्वीकृति नहीं मिल सकी है। परिणामस्वरूप चार्जशीट दाखिल नहीं हो पा रही और मामले वर्षों से फाइलों में अटके हुए हैं।कानूनी जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में समय पर अभियोजन स्वीकृति न मिलने से मुकदमे की गति प्रभावित होती है। वहीं भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।
रंगे हाथों पकड़े गए… लेकिन अदालत तक नहीं पहुंचे
लोकायुक्त की ट्रैप कार्रवाई में अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं। मौके से नकदी जब्त होती है, स्वतंत्र गवाह होते हैं, वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए जाते हैं और विस्तृत जांच होती है।लेकिन इसके बाद सबसे बड़ी बाधा बनती है विभागीय मंजूरी।जब तक संबंधित विभाग अभियोजन स्वीकृति नहीं देता, तब तक लोकायुक्त विशेष न्यायालय में चालान पेश नहीं कर सकता।यानी जांच पूरी होने के बाद भी मुकदमा आगे नहीं बढ़ पाता।
38 फाइलें विभागों में अटकीं
सूत्रों के अनुसार लोकायुक्त के पास ऐसे 38 मामले लंबित हैं जिनमें जांच पूरी हो चुकी है।इनमें शामिल हैं रिश्वत लेते हुए ट्रैप किए गए प्रकरण, आय से अधिक संपत्ति के मामले, पद के दुरुपयोग के आरोप, सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े प्रकरण, लेकिन अभियोजन स्वीकृति लंबित होने के कारण इनमें न्यायिक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
छह महीने में 19 ट्रैप… फिर भी रिश्वतखोरी जारी
लोकायुक्त के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में ही 19 ट्रैप प्रकरण दर्ज किए गए।इन मामलों में आरोप है कि सरकारी कर्मचारियों ने नागरिकों से उनके वैध कार्य करने के एवज में रिश्वत की मांग की।इसके अतिरिक्त पद के दुरुपयोग के 2 मामले भी दर्ज किए गए।ये आंकड़े संकेत देते हैं कि विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सबसे आगे राजस्व विभाग
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष लोकायुक्त की सबसे अधिक कार्रवाई राजस्व विभाग में हुई। नामांतरण, सीमांकन, ऋण पुस्तिका, रिकॉर्ड सुधार और अन्य राजस्व कार्यों में रिश्वत मांगने की शिकायतों पर लगभग आधा दर्जन ट्रैप कार्रवाई की गई। इसके बाद—पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग स्वास्थ्य विभाग नगरीय प्रशासन एवं विकास विभागस्कूल शिक्षा विभाग में भी ट्रैप कार्रवाई दर्ज की गई।
किस विभाग में किस बात पर मांगी गई रिश्वत?
राजस्व विभाग नामांतरण, सीमांकन, ऋण पुस्तिका और रिकॉर्ड संबंधी कार्य। पंचायत एवं ग्रामीण विकास निर्माण कार्यों का मूल्यांकन, भुगतान और पंचायत स्तर के कार्य। स्वास्थ्य विभाग मेडिकल बिल, प्रशासनिक अनुमतियां और अन्य विभागीय प्रक्रियाएं। नगरीय प्रशासन भवन अनुज्ञा, भुगतान, कर रिकॉर्ड और नामांतरण संबंधी कार्य। स्कूल शिक्षा विभाग एरियर, स्वीकृतियां और संकुल स्तर के प्रशासनिक कार्य। इन मामलों में लोकायुक्त द्वारा कार्रवाई किए जाने का दावा किया गया है।
अभियोजन स्वीकृति क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक के विरुद्ध अदालत में अभियोजन शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होती है।इसका उद्देश्य निराधार मुकदमों से सरकारी कर्मचारियों की रक्षा करना है।लेकिन यदि निर्णय अनावश्यक रूप से लंबित रहे, तो इससे भ्रष्टाचार मामलों की सुनवाई भी प्रभावित हो सकती है।
3-4 महीने का प्रावधान… लेकिन इंतजार वर्षों का?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय यथासंभव सीमित समय में लिया जाना चाहिए, ताकि जांच और मुकदमे में अनावश्यक विलंब न हो।यदि फाइलें लंबे समय तक विभागों में लंबित रहती हैं, तो इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया धीमी होती है बल्कि भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठते हैं।
क्या कमजोर पड़ रही है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई?
जब लोकायुक्त किसी अधिकारी को रंगे हाथों पकड़ती है, तब जनता को उम्मीद होती है कि मामला अदालत तक पहुंचेगा और दोष सिद्ध होने पर सजा मिलेगी।लेकिन यदि जांच पूरी होने के बाद भी चार्जशीट दाखिल न हो सके, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अभियोजन स्वीकृति में देरी क्यों? किन विभागों में सबसे अधिक फाइलें लंबित हैं? क्या सभी मामलों में समयबद्ध निर्णय लिया जा रहा है? यदि नहीं, तो इसकी जवाबदेही किसकी है?
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