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एसडीएम जांच दल की डिटेल पुलिस FIR में कैसे बदल गई..?

July 27, 2026

  • विधायक लखन घनघोरिया ने विस में उठाया गेहूं उपार्जन घोटाला, लिखित जवाब से खड़े हुए कई बड़े और गंभीर सवाल

जबलपुर। मझौली ब्लॉक के बहुचर्चित गेहूं उपार्जन घोटाले को लेकर विधानसभा में सरकार द्वारा दिए गए लिखित जवाब के बाद पूरे मामले ने नया राजनीतिक और प्रशासनिक मोड़ ले लिया है। कांग्रेस विधायक लखन घनघोरिया द्वारा विधानसभा के प्रश्न क्रमांक 32719 के माध्यम से उठाए गए सवालों ने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार से पूछा गया कि मूल जांच रिपोर्ट में कथित बदलाव, जांच दल के सदस्यों में परिवर्तन और एफआईआर में दर्ज तथ्यों के बीच विरोधाभास पर आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी।


  • विधानसभा में पूछे गए प्रश्नों में कहा गया कि जबलपुर के अनुविभागीय राजस्व अधिकारी द्वारा गठित पांच सदस्यीय जांच दल और मझौली थाने में दर्ज एफआईआर में उल्लिखित जांच दल के सदस्यों के नाम अलग अलग क्यों हैं? इसके साथ ही यह भी पूछा गया कि मूल जांच रिपोर्ट के बिंदु क्रमांक 11 में कथित रूप से पाटन तहसील के अनाज कारोबारी संदीप दुबे का नाम शामिल था, जिसे बाद नई जांच रिपोर्ट से किस आधार पर संदीप दुबे का नाम हटाया गया। विधायक ने यह भी सवाल उठाया कि यदि प्रारंभिक जांच अधिकारी रहे खाद्य विभाग के प्रमोद मिश्रा को बाद में स्वयं आरोपी बनाया गया, तो उनकी रिपोर्ट में संशोधन कर नई जांच रिपोर्ट तैयार करने और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर नया जांच दल गठित करने का कानूनी आधार क्या था? सदन में यह मुद्दा भी गूंजा कि जांच के दौरान बरामद कुछ पर्चियों में तत्कालीन मझौली तहसीलदार के नाम के सामने 50 हजार रुपये लिखे होने की बात सामने आई थी, जबकि उस दौरान दिलीप हनवत बतौर तहसीलदार पदस्थ थे और उक्त उपार्जन केन्द्र की निगरानी का जिम्मा भी उन्हीं पर था। इस संबंध में संबंधित अधिकारी अथवा अन्य व्यक्ति के विरुद्ध कोई जांच या कार्रवाई हुई या नहीं, इसका भी सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा गया। प्रश्न में यह भी पूछा गया कि एफआईआर में जिस जांच दल का उल्लेख किया गया, उसके गठन संबंधी शासकीय आदेश की आवक जावक प्रविष्टि अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय सिहोरा के रजिस्टर में दर्ज हैं या नहीं। साथ ही यह भी जानना चाहा गया है कि 4 जून 2026 तक तैयार मूल जांच रिपोर्ट में बिंदु 1 से 10 तक समान रहने के बावजूद केवल बिंदु क्रमांक 11 में बदलाव कर संदीप दुबे का नाम हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी और इस कथित हेरफेर के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सरकार कब तक कार्रवाई करेगी।

    सदन में सरकार के जवाब पर उठे गंभीर सवाल
    सरकार का लिखित जवाब सामने आने के बाद मझौली गेहूं घोटाले की जांच प्रक्रिया पर एक बार फिर सवालों की बौछार शुरू होने की सम्भावना जताई जा रही है। विपक्ष मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहा है। वहीं पाटन मझौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक अजय विश्नोई द्वारा सदन में स्वयं को जांच प्रक्रिया में शामिल करने का आग्रह भी राजनीतिक चर्चाओं का विषय बना हुआ है। विधानसभा क्षेत्र में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कोई कहता है दूध के कटोरे की निगरानी का जिम्मा चलाक बिल्ली को देना कहा तक जायज है। कोई कहता है संदीप दुबे को किसका संरक्षण है यह बात किसी से छुपी नहीं है। इन सभी चर्चाओं और आरोपों के बीच जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस बहुचर्चित मामले के असली दोषियों तक कभी कानून के हाथ पहुंच पाएंगे या फिर यह फाइलें भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों के अंधेरे में ही कहीं गुम होकर रह जाएंगी। प्रशासनिक गलियारों में दबी जुबान से यह भी कहा जा रहा है कि इस स्तर के बदलाव बिना किसी बड़े संरक्षण के संभव नहीं हो सकते हैं। स्थानीय स्तर पर आम जनता और किसानों के बीच भी इस बात को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है कि किस प्रकार गरीबों का हक मारने वाले खाद्यान्न घोटाले में लीपापोती करने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि इन सभी चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और जांच एजेंसियां इन सभी गंभीर सवालों पर आगे क्या कड़े कदम उठाती हैं और इस बहुचर्चित मझौली उपार्जन घोटाले में आने वाले दिनों में और कौन सा नया तथा चौंकाने वाला मोड़ जनता जनार्दन के सामने उजागर होता है।

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