
उज्जैन। बदलती जीवनशैली, कम उम्र में होने वाले हार्मोनल बदलाव और फास्ट फूड की बढ़ती आदतों के कारण अब 10 से 15 साल की बच्चियों में भी ब्रेस्ट में गांठ (फाइब्रोएडेनोमा) के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले यह समस्या मुख्य रूप से युवतियों और महिलाओं में देखी जाती थी, लेकिन अब कम उम्र की बच्चियां भी इसकी चपेट में आ रही हैं। कई मामलों में गांठ का आकार बढऩे पर ऑपरेशन कर उसे निकालना पड़ता है।
अत्यधिक फास्ट फूड और 10 से 11 साल तक की बच्चियों में तेजी से हो रहे हार्मोनल बदलाव के कारण ब्रेस्ट माउस (हिलती हुई बड़ी गठान) की समस्या सामने आ रही है, वहीं 40 साल तक की महिलाओं में अत्यधिक गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन इसकी वजह बन रहा है, जिसके चलते हर दिन लगभग 10 महिलाओं की सर्जरी की जा रहे हैं। कैंसर रहित गठान अत्यधिक दर्द और इधर-उधर खिसकने के कारण तकलीफ देती है। ज्यादा बड़ा आकार हो जाने के कारण इसे निकालना जरूरी हो रहा है। सिविआईसी इंटरवेंशनल केयर वैक्यूम असिस्टेड एक्सिशन तकनीक के जरिए अब बिना बड़े ऑपरेशन के केवल 2 से 3 मिलीमीटर के छोटे चीरे से ब्रेस्ट की गांठ निकाली जा रही है। इससे मरीज को कम दर्द, कम रक्तस्राव और उसी दिन अस्पताल से छुट्टी मिल पा रही है। मध्यप्रदेश में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
मोटापा और बदलती जीवनशैली से खतरा
कम उम्र में हार्मोनल परिवर्तन, अनियमित खान-पान, जंक और फास्ट फूड का अधिक सेवन, मोटापा तथा बदलती जीवनशैली इस समस्या को तेजी से बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं। यदि गांठ में लगातार वृद्धि हो रही हो या दर्द और असहजता महसूस हो तो तुरंत विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। नई वैक्यूम असिस्टेड तकनीक से बिना टांके और बिना बड़े ऑपरेशन के सुरक्षित उपचार संभव है।
गठान निकालना पड़ती है सर्जरी कर
फाइब्रोएडेनोमा ब्रेस्ट की एक सामान्य और गैर-कैंसरयुक्त गांठ होती है। वर्तमान में 40 वर्ष तक की महिलाओं में इसके मरीज लगातार बढ़ रहे हैं और कई अस्पतालों में हर दिन करीब 10 सर्जरी कर गांठ निकालनी पड़ रही है। समय पर जांच और उपचार से मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। डॉ. शैलेष गुप्ता ने बताया कि जरूरी जांच और बायोप्सी करने के बाद सर्जरी की जा रही है। इस प्रक्रिया में ब्रेस्ट की बनावट प्रभावित नहीं होती, निशान भी बेहद छोटा रहता है और मरीज जल्द सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है।
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