
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्कूल की प्रिंसिपल को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने प्रिंसिपल के पति के खिलाफ चल रहे मामले में निचली अदालत की कार्रवाई जारी रखने का आदेश दिया है। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने 25 अगस्त को प्रिंसिपल और उनके पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि कथित जातिसूचक गालियां जिस जगह दी गईं, वह ऐसी जगह नहीं थी जिसे ‘सार्वजनिक नजर में’ या ‘public view’ में कहा जा सके।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कथित अपराध किसी निजी जगह या बंद कमरे के अंदर हुआ हो और वहां आम लोगों की सीधी मौजूदगी या नजर न हो, तो उसे कानून के तहत ‘सार्वजनिक नजर में’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले के तथ्यों और कानून की स्थिति को देखते हुए प्रिंसिपल के खिलाफ आरोप तय करने वाला निचली अदालत का आदेश रद्द करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित है। इसके आधार पर कोर्ट ने प्रिंसिपल के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने प्रिंसिपल के पति को राहत नहीं दी। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उसके खिलाफ लगाए गए अपराध प्रथम दृष्टया बनते हैं, इसलिए उसके खिलाफ कार्यवाही जारी रहेगी। प्रिंसिपल और उनके पति ने दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट की विशेष अदालत के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(x) के साथ IPC की धाराओं 323, 427, 500, 506, 186, 353 और 34 के तहत आरोप तय किए गए थे।
मामला 25 जून 2014 की एक घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर को स्कूल में आग लगने की सूचना मिली थी। उस समय याचिकाकर्ता महिला स्कूल की प्रिंसिपल थीं। इंस्पेक्टर ने उन्हें आग की जानकारी दी थी। इसके बाद 26 जून 2014 को प्रिंसिपल अपने पति के साथ स्कूल की पहली और दूसरी मंजिल पर बने क्लासरूम देखने गई थीं। उनके साथ उस समय कोई सुरक्षा गार्ड नहीं था। प्रिंसिपल का आरोप था कि जब वह और उनके पति एक क्लासरूम में थे, तब पुलिस इंस्पेक्टर ने उनके साथ बदसलूकी की। आरोप के मुताबिक, इंस्पेक्टर ने उनका हाथ पकड़ा, उन्हें चुप रहने की धमकी दी और नीचे जाने से रोकने की कोशिश की।
घटना के बाद 26 जून 2014 को पश्चिमी दिल्ली के निहाल विहार थाने में इंस्पेक्टर के खिलाफ IPC की धाराओं 341, 354A और 354 के तहत FIR दर्ज कराई गई थी। प्रिंसिपल और उनके पति की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि पुलिस इंस्पेक्टर ने उनके खिलाफ SC/ST एक्ट का मामला इसलिए दर्ज कराया, क्योंकि प्रिंसिपल ने पहले उनके खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ताओं ने इसे पहले दर्ज कराई गई FIR का ‘काउंटरब्लास्ट’ यानी बदले में दर्ज कराया गया मामला बताया। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि कथित घटना के करीब एक साल बाद, 30 जून 2015 को शिकायत दर्ज की गई। इसलिए यह शिकायत बाद में सोच-समझकर की गई कार्रवाई थी।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि प्रिंसिपल के पति को भी गलत तरीके से मामले में फंसाया गया। उनके मुताबिक, पति केवल आग लगने के बाद पैदा हुई स्थिति में अपनी पत्नी का साथ देने के लिए स्कूल पहुंचे थे। मामले में पुलिस इंस्पेक्टर पर पहले दर्ज कराई गई कथित छेड़छाड़ की FIR में बाद में मुकदमा चला और वह उस मामले में बरी हो चुका है। फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रिंसिपल के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत आरोप खत्म हो गए हैं, जबकि उनके पति के खिलाफ निचली अदालत में आगे की कार्यवाही जारी रहेगी।
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