
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में एसआईआर (SIR) के दौरान जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट (Voter List) से कट गए थे, उनके लिए हाईकोर्ट (High Court) से रिटायर जज की अध्यक्षता में चुनाव आयोग (Election Commission) ने एक ट्रिब्यूनल का गठन किया था। उनमें कई रिटायर जजों को शामिल किया गया था। इनका काम एसआईआर से जुड़े लंबित मामलों को निपटाना था। हालांकि, अब जो खबर सामने आ रही है वह वैसे वैध मतदाताओं की चिंता बढ़ा सकती है, जिनका नाम गलत तरीके से वोटर लिस्ट से बाहर हो गया था।
कलकत्ता हाईकोर्ट के रिटायर जज विश्वजीत बसु ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए पश्चिम बंगाल के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया है। वे मतदाता सूची संशोधन अपीलों की सुनवाई के लिए गठित 19 ट्रिब्यूनल पैनलों के अध्यक्ष बनाए गए थे। वह इस्तीफा देने वाले चौथे जज बन गए हैं। जस्टिस बसु से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी.एस. शिवगणनम, रिटायर जज रणजीत कुमार बाग और इंद्रजीत चटर्जी भी इस ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे चुके हैं।
क्यों हुआ था ट्रिब्यूनल का गठन?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनाव आयोग (EC) ने मार्च में पश्चिम बंगाल के लिए 19 ट्रिब्यूनल का गठन किया था। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान तार्किक विसंगतियों और अन्य कारणों से बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए थे। इन ट्रिब्यूनल का मुख्य काम उन लाखों मतदाताओं द्वारा दायर की गई अपीलों की सुनवाई करना था, जिनके नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं।
मुर्शिदाबाद में सुनवाई पूरी तरह ठप
चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जजों के इस्तीफे का सबसे बुरा असर मुर्शिदाबाद जिले पर पड़ेगा, जहां से सबसे अधिक संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। मुर्शिदाबाद जिले के मामलों की सुनवाई का जिम्मा जस्टिस विश्वजीत बसु और जस्टिस इंद्रजीत चटर्जी को सौंपा गया था। महज एक महीने के भीतर दोनों जजों के पद छोड़ देने से मुर्शिदाबाद के मतदाताओं की अपीलों का निपटारा पूरी तरह ठप हो गया है, जिससे लंबित मामलों को निपटाने की ट्रिब्यूनल की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
इस्तीफों के पीछे की क्या वजहें?
पूर्व जज इंद्रजीत चटर्जी ने रोजाना 22 किलोमीटर की यात्रा करने में होने वाली कठिनाई को इस्तीफे की वजह बताया। उन्होंने 2-3 महीने की अस्थायी जिम्मेदारी समझकर पद स्वीकार किया था, लेकिन मुकदमों की भारी संख्या के चलते उन्होंने पीछे हटने का फैसला किया। जस्टिस बसु ने इस्तीफा देने से पहले कहा था कि लाखों मामलों को इस तरह से हल करना थोड़ा मुश्किल है। चूंकि यह काम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर किया जा रहा है, इसलिए इसे इसी तरह आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने ट्रिब्यूनल को अधिक प्रभावी ढंग से चलाने के लिए बुनियादी ढांचे को सुधारने की जरूरत पर जोर दिया था।
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