इंदौर

तीन हजार करोड़ के प्राधिकरण भूखंड हाईकोर्ट आदेश से हो गए मुक्त

  • भूमाफियाओं और उनकी जेबी संस्थाओं के खिलाफ अग्निबाण की तथ्यात्मक खबरों पर एक बार फिर लगी सच्चाई की मोहर… 20 फीसदी विकसित भूखंड हासिल करने के मामले में लगी 50 याचिकाएं एक साथ खारिज

इंदौर, राजेश ज्वेल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने कल दो महत्वपूर्ण आदेश पारित किए, जिसमें इंदौर विकास प्राधिकरण के साथ अनुबंधित गृह निर्माण संस्थाओं और अन्य द्वारा दायर की गई 50 रीट अपील की सुनवाई करने के बाद सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। सिर्फ एक संस्था त्रिशला को सशर्त 20 फीसदी भूखंड हासिल करने की पात्रता दी, जबकि योजना 140, 136, 134, 135 सहित अन्य में किसी भी संस्था को विकसित भूखंड नहीं मिलेंगे। इन फैसलों से प्राधिकरण को तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक के भूखंड विक्रय के लिए हासिल हो गए हैं और उसके साथ ही अग्निबाण की तथ्यात्मक खबरों पर एक बार फिर सत्यता की मोहर भी लग गई। अग्निबाण ने ही वर्ष 2016 में योजना 140 सहित अन्य में नए भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24 (2) की की जा रही व्याख्या और भूमाफियाओं को उपकृत करने के बोर्ड संकल्प के खिलाफ खबरें प्रकाशित की।

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ समय पूर्व 517 पेज का ऐतिहासिक फैसला दिया, जिसमें संविधान पीठ ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 24 (2) की स्पष्ट व्याख्या कर दी। उससे भी प्राधिकरण को दो हजार करोड़ रुपए से अधिक का फायदा हुआ। दरअसल इसी धारा की मनमानी व्याख्या कर प्राधिकरण के तत्कालीन राजनीतिक बोर्ड और अधिकारियों ने भूमाफिया और उनकी जेबी संस्थाओं को 20 फीसदी विकसित भूखंड लुटाने का गेम प्लान बनाया, जो अग्निबाण की सतर्कता से चौपट हो गया। अभी कल हाईकोर्ट ने भी अपने दो महत्वपूर्ण फैसलों में अग्निबाण की ही खबरों पर सत्यता की मोहर लगा दी। न्यायमूर्ति द्वय विवेक रूसिया और अनिल वर्मा की खंडपीठ ने लगभग 50 रीट अपीलों पर फैसले दिए हैं।

इसमें हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 20 फीसदी विकसित भूखंडों का लाभ गृह निर्माण संस्थाओं को नहीं मिल सकता। आवास नीति सिर्फ किसानों और उन जैसे जमीन मालिकों के लिए मध्यप्रदेश शासन ने बनाई थी, लेकिन इसकी आड़ में तमाम जेबी संस्थाओं ने प्राधिकरण के साथ अनुबंध कर लिए और बेशकीमती भूखंड हासिल करने के खेल किए जाने लगे। योजना क्र. 135, 136, 134 से लेकर 140 में शामिल रसूखदारों और गृह निर्माण संस्थाओं ने हाईकोर्ट में रीट अपीलेें दायर कर रखी थीं। सिंगल बेंच ने महावीर गृह निर्माण सहकारी संस्था के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे प्राधिकरण ने डबल बेंच में चुनौती दी। उसके बाद अन्य रीट अपीलें भी एक-एक कर जुड़ती रही, जिसमें मध्यप्रदेश शासन, कलेक्टर, भू-अर्जन अधिकारी के साथ-साथ संचालक नगर तथा ग्राम निवेश और प्राधिकरण को पार्टी बनाया गया। इन सभी रीट अपीलों पर हाईकोर्ट ने फैसला दिया है, जिसके चलते इंदौर विकास प्राधिकरण की लॉटरी ही लग गई है।

दरअसल हाईकोर्ट में चल रहे इन लम्बित प्रकरणों के कारण बीते कई वर्षों से प्राधिकरण अपनी योजनाओं में उपलब्ध भूखंडों को बेच नहीं पा रहा था। यहां तक कि प्राधिकरण की वर्तमान में सबसे चर्चित और महंगी योजना 140 में भी कोर्ट-कचहरी के चलते भूखंडों की बिक्री ठप हो गई थी, क्योंकि कुछ वर्ष पूर्व प्राधिकरण ने टेंडर बुलाए थे, उनके खिलाफ संस्थाओं ने स्टे हासिल कर लिया था। मगर अब प्राधिकरण अपने इन भूखंडों को बेच सकेगा और तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक की आमदनी होगी, जो शहर के विकास में इस्तेमाल होगी। नए फ्लायओवर-सडक़ों के निर्माण आसानी से हो सकेंगे।

जीतकर भी हारी त्रिशला… 10.25 हेक्टेयर जमीन की मालकियत के सौंपना पड़ेंगे दस्तावेज
हाईकोर्ट का जो कल एक दूसरा फैसला त्रिशला गृह निर्माण संस्था के संबंध में आया है। उसका पालन करने में भी संस्था को पसीने छूट जाएंगे। दरअसल योजना 140 में त्रिशला और मेघना गृह निर्माण संस्थाओं ने 20 प्रतिशत विकसित भूखंड आवास नीति के तहत हासिल करने के अलावा 20 प्रतिशत भूखंड तत्कालीन गाइडलाइन पर भी कबाडऩे का अनुबंध प्राधिकरण के राजनीतिक बोर्ड और अफसरों के साथ सांठगांठ कर कर लिया था। यानी 40 फीसदी भूखंड इन दोनों संस्थाओं को हासिल होते। योजना 140 में एक हजार करोड़ से अधिक के इन भूखंडों की डकैती का गेम प्लान भी अग्निबाण ने 2016 में प्रकाशित की गई तथ्यात्मक खबरों के चलते चौपट कर दिया था और बोर्ड संकल्प पारित करने के बावजूद 20 फीसदी भूखंड इन दोनों संस्थाओं को नहीं दे पाया। उसके बाद धारा 24 (2) की सुप्रीम कोर्ट ने भी व्याख्या कर दी।

मगर चूंकि त्रिशला गृह निर्माण संस्था ने भू-अर्जन अवॉर्ड पारित होने के पहले ही प्राधिकरण के साथ अनुबंध कर लिया था। लिहाजा हाईकोर्ट ने उसे सशर्त 20 फीसदी विकसित भूखंड की पात्रता दी है, लेकिन साथ में यह शर्त भी जोड़ दी कि संस्था को पूरी अनुबंधित की गई 10.25 हेक्टेयर जमीन की मालकियत के दस्तावेज सौंपना पड़ेंगे और अगर संस्था इस फैसले पर 6 माह के भीतर कोई निर्णय नहीं ले पाती है तो फिर प्राधिकरण अपने पूर्व में पारित किए गए संकल्प के आधार पर निर्णय ले सकेगा। दरअसल प्राधिकरण ने संस्था से किए गए अनुबंध की निरस्ती का संकल्प पारित किया था, जिसे संस्था ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। दरअसल 2.121 हेक्टेयर जमीनों की मालकियत के दस्तावेज संस्था प्राधिकरण को नहीं सौंप पाई थी। अब चूंकि 2005 में ही अवॉर्ड पारित होने के साथ धारा 4 का नोटिफिकेशन हो चुका है, लिहाजा संस्था कोई नई सेल डीड भी नहीं कर सकती।

शासन की आवास नीति सिर्फ किसानों के लिए ही
प्राधिकरण की ओर से हाईकोर्ट में खड़े हुए अभिभाषकों ने तर्क दिया कि शासन ने जो आवास नीति बनाई उसका लाभ किसानों को ही मिलता था। हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि आवास नीति के बिन्दु क्र. 6.6 का लाभ योजना में शामिल जमीनों के मालिक, जिनमें अधिकांश कृषक होते हैं, को भागीदार बनाकर उनकी सहमति से जमीन प्राप्त करने के लिए 20 फीसदी भूखंड देने का निर्णय लिया गया, ताकि जमीन अधिग्रहण की लम्बी प्रक्रिया से बचा जा सके। मगर इसका लाभ रसूखदार या गृह निर्माण संस्थाएं नहीं उठा सकती।

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