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टीएमसी पर दावेदारी की जंग निर्णायक मोड़ पर, चुनाव आयोग में आज जमा होंगे दावे; नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला आगे

July 06, 2026

कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में छिड़ी अंदरूनी लड़ाई अब निर्णायक चरण में पहुंच गई है। सोमवार को पार्टी के दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट चुनाव आयोग (EC) के समक्ष अपने-अपने दस्तावेज जमा करेंगे और पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न तथा संगठन पर अधिकार का दावा पेश करेंगे। पार्टी के गठन के 28 वर्षों में यह पहला मौका है, जब टीएमसी (TMC) के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर इतना बड़ा विवाद सामने आया है।

चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद उन्हें 6 जुलाई शाम 5:30 बजे तक आवश्यक दस्तावेज, संगठनात्मक रिकॉर्ड और समर्थन से जुड़े प्रमाण जमा करने का निर्देश दिया था। अब समयसीमा पूरी होने के बाद आयोग सभी दस्तावेजों की जांच करेगा और फिर दोनों पक्षों को विस्तृत सुनवाई के लिए बुलाएगा।

‘जोड़ा घास-फूल’ चुनाव चिह्न पर भी दावा

विवाद केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं है। दोनों गुट टीएमसी के लोकप्रिय ‘जोड़ा घास-फूल’ चुनाव चिह्न, पार्टी मुख्यालय, संगठनात्मक ढांचे, वित्तीय संसाधनों और अन्य संपत्तियों पर भी अपना-अपना अधिकार जता रहे हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुआ असंतोष अब पूरी पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई में बदल चुका है।


  • ममता गुट और बागी गुट की अलग-अलग दलील

    सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी समर्थक गुट की ओर से वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी नई दिल्ली पहुंचकर चुनाव आयोग को दस्तावेज सौंपेंगे। यह गुट पार्टी की स्थापना, उसके इतिहास और संगठन की निरंतरता को अपने दावे का आधार बना रहा है।

    वहीं, ऋतब्रत बनर्जी समर्थक गुट का कहना है कि उसे विधानसभा में दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त है। गुट का दावा है कि इस संबंध में आवश्यक दस्तावेज पहले ही आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके हैं। उनका तर्क है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का बहुमत उनके साथ है, इसलिए पार्टी पर उनका अधिकार बनता है।

    विधायक दल से शुरू हुआ विवाद, संगठन तक पहुंचा

    शुरुआत में यह टकराव केवल विधायक दल के नेतृत्व तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे संगठन के नियंत्रण की लड़ाई बन गया। पिछले महीने बागी गुट ने एक विशेष बैठक बुलाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष चुना और समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व की घोषणा कर दी। बागी नेताओं का आरोप है कि वर्तमान नेतृत्व अब निर्वाचित प्रतिनिधियों का विश्वास खो चुका है।

    विधायकों के समर्थन का दावा

    बागी गुट ने पहली बार अपनी ताकत उस समय दिखाई, जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में मतदान किया और पार्टी नेतृत्व के आधिकारिक उम्मीदवार का विरोध किया। अब यह गुट करीब 65 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहा है।

    सांसदों के दल बदलने से बढ़ा राजनीतिक संकट

    विवाद का असर संसद तक भी पहुंच चुका है। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 21 लोकसभा सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का दामन थाम लिया। इससे संसद में टीएमसी की स्थिति कमजोर हुई है और पार्टी की राजनीतिक वैधता को लेकर विवाद और गहरा गया है।

    अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेजों और दावों की जांच के बाद यह तय करेगा कि पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर किसका वैध अधिकार माना जाए।

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