
नई दिल्ली । कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने गृहिणी (Homemaker) की भूमिका और परिवार की देखभाल में उसके योगदान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी (Important Remark) की है। अदालत ने कहा कि किसी महिला को गृहिणी (Homemaker) मानने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह अशिक्षित हो, केवल घर के काम करती हो या पूरे समय घर में ही रहती हो। यदि कोई महिला अपने परिवार की देखभाल और घर की जिम्मेदारियों में योगदान देती है, तो उच्च शिक्षा (Higher Education) हासिल करने या नौकरी करने के बावजूद उसे गृहिणी माना जा सकता है।
यह टिप्पणी कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम की बस से जुड़े एक सड़क हादसे के मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। मामले में एक महिला 2013 में हुई बस दुर्घटना में घायल हो गई थी। महिला ने जैव प्रौद्योगिकी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया था और उसके बारे में बताया गया कि वह उस समय लेक्चरर के तौर पर काम कर रही थी।
दुर्घटना के बाद महिला ने अपनी कमाई के नुकसान और चोटों से जुड़े प्रभावों को देखते हुए अधिक मुआवजे की मांग की थी। मामले की सुनवाई कर रहे मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने उसकी संभावित आय के आधार पर मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
परिवहन निगम की ओर से यह तर्क भी रखा गया था कि हादसे के समय महिला के नौकरीपेशा होने का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं था। साथ ही यह दलील दी गई कि महिला की उच्च शैक्षणिक योग्यता को देखते हुए उसे केवल गृहिणी नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति चिल्लाकुर सुमलता की पीठ ने कहा कि घर पर परिवार के सदस्यों की सेवा और देखभाल करने वाली महिला को उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर गृहिणी की भूमिका से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार कोई महिला डिग्री, पोस्ट ग्रेजुएशन या डॉक्टरेट की उपाधि रखने के बावजूद गृहिणी हो सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला को गृहिणी साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक नहीं है कि वह अनपढ़ है, 24 घंटे घर में रहती है या केवल घरेलू काम करती है। अदालत ने परिवार के लिए किए जाने वाले देखभाल और सेवा संबंधी कार्यों को भी महत्वपूर्ण योगदान माना।
फैसले में गृहिणी की भूमिका को केवल घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं रखा गया। अदालत ने ऐसे व्यक्ति को भी होममेकर की श्रेणी में रखने की बात कही जो लगातार मेहनत करता है, अपने व्यक्तिगत आराम का त्याग करता है और परिवार के बेहतर संचालन में योगदान देता है। अदालत ने यह भी कहा कि होममेकर शब्द केवल महिलाओं के लिए निर्धारित नहीं है और घर की जिम्मेदारियां निभाने वाला पुरुष भी इस दायरे में आ सकता है।
मुआवजे के मामले में हाईकोर्ट ने महिला के नौकरीपेशा होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं होने के कारण उसकी काल्पनिक आय 8,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित की। चोटों की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने माना कि उसे कम से कम तीन महीने तक आराम की जरूरत रही होगी। इस अवधि में वह परिवार की सामान्य देखभाल करने में असमर्थ रही होगी।
तीन महीने की अवधि के आधार पर परिवार की सेवा नहीं कर पाने से जुड़े नुकसान के लिए 24,000 रुपये की राशि निर्धारित की गई। इसके अलावा न्यायाधिकरण द्वारा तय राशि के ऊपर कुल 1,96,800 रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया। इस फैसले में अदालत ने घरेलू जिम्मेदारियों को परिवार और मुआवजा निर्धारण के संदर्भ में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखा है।
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