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इंदौर: जिन्हें उंगली पकडक़र चलना सिखाया, उन्हीं 400 देवतुल्य पिता के लिए घर में जगह नहीं

June 21, 2026

आज फादर्स डे… इंदौर के 10 वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर, 465 से अधिक मामले कलेक्टर कार्यालय में भरण-पोषण के चल रहे

इन्दौर। जिस पिता (father) ने अपने बच्चों (children) की हर जरूरत पूरी करने के लिए जिंदगी भर संघर्ष किया, वही पिता आज अपने बुढ़ापे में दो वक्त की रोटी और अपनापन पाने के लिए वृद्धाश्रम (Old Age Home) का दरवाजा खटखटा रहा है, जिस हाथ ने बेटे की उंगली पकडक़र चलना सिखाया, जिस कंधे पर बैठाकर मेले, बाजार और दुनिया दिखाई, उसी पिता के लिए आज घर में जगह नहीं बची। फादर्स-डे पर यह तस्वीर समाज के सामने कई सवाल खड़े करती है। इंदौर में संचालित हो रहे 10 से ज्यादा वृद्धाश्रम में 400 से अधिक पिता निवास करते हैं, जो अभी अपने बच्चों और पोते से मिलने की तड़प लेकर जैसे-तैसे जिंदा है। वही 465 ऐसे मामले भी विभिन्न अनुभागीय अधिकारियों के समक्ष अपने बेटों से भरण पोषण की गुहार कर रहे हैं।



  • तेजी से विकसित हो रहे इंदौर में हर सुविधा उपलब्ध हो रही है। चकाचोंध और भागती जिंदगी के पीछे संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही है। इंदौर में वर्तमान में 10 वृद्धाश्रम संचालित हैं, जहां 558 बुजुर्ग रह रहे हैं। इन आश्रमों में रहने वाले कई बुजुर्गों के बेटे-बेटियां जीवित हैं, लेकिन उनके पास अपने माता-पिता के लिए समय नहीं है, वहीं कलेक्टर कार्यालय में अब तक 500 से अधिक ऐसी शिकायतें और भरण पोषण की मामले कोर्ट में चल रहे हैं, जिनकी कहानी सुनकर कलेक्टर से लेकर अधिकारियों तक की आंखें नम हो जाती हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार अधिकांश बुजुर्ग आर्थिक अभाव से अधिक भावनात्मक उपेक्षा का दर्द लेकर आश्रम पहुंचते हैं। कई महीनों तक कोई मिलने नहीं आता। कई को त्योहारों पर भी अपने बच्चों का इंतजार रहता है। कुछ बुजुर्ग तो ऐसे हैं, जिनके बेटे इसी शहर में रहते हैं, लेकिन वर्षों से मिलने तक नहीं पहुंचे। फादर्स-डे पर जब सोशल मीडिया पर पिता के सम्मान में संदेशों की बाढ़ आती है, तब इन वृद्धाश्रमों के कमरों में बैठे सैकड़ों पिता सिर्फ एक फोन कॉल, एक मुलाकात और अपने बच्चों के स्नेह का इंतजार करते हैं। हालांकि, वृद्धाश्रमों में अब सिर्फ भोजन और दवा ही नहीं, बल्कि नया परिवार भी मिलता है। यहां साथ रहने वाले बुजुर्ग एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।

    उनकी बस इतनी सी है चाहत… एक बार पूछ ले पापा आप कैसे हो
    बेटा चला गया, अब फोन भी कम आता है
    मैंने बेटे को अच्छी पढ़ाई कराई। घर बेचकर उसे पढ़ाया। शुरू में हर सप्ताह फोन आता था, फिर महीने में एक बार और अब कई-कई महीने गुजर जाते हैं। जब तबीयत बिगड़ी तो पड़ोसियों ने मुझे वृद्धाश्रम पहुंचाया। यहां लोग अपने हैं, लेकिन बेटे की आवाज आज भी कानों में गूंजती है। फादर्स-डे पर बस इतना चाहता हूं कि वह एक बार कह दे- पापा आप कैसे हैं?

    बहू ने कहा- अब सेवा नहीं कर सकते
    पूरी जिंदगी नौकरी की, बच्चों को पढ़ाया, शादी कराई। शरीर थकने के बाद लगा अब परिवार के साथ समय बिताऊंगा, लेकिन धीरे-धीरे मैं घर में बोझ बन गया। एक दिन साफ कह दिया गया कि अब हमारी सेवा करना संभव नहीं। डेढ़ महीने से ब्रिज के नीचे पड़ा रहा कलेक्टर ने मुझे वृद्धाश्रम पहुंचा दिया। यहां सम्मान मिलता है, लेकिन अपना घर कभी नहीं भूलता।

    पोते की हंसी याद आती है
    हर शाम पोते को पार्क घुमाने ले जाता था। उसके साथ खेलता था। आज कई साल हो गए उसे देखा नहीं। वह बड़ा हो गया होगा। शायद उसे मेरा चेहरा भी याद न हो। वृद्धाश्रम में बच्चे जब मिलने आते हैं तो पोते की याद और ज्यादा सताती है। पिता रमेश ग़ोयल

    रोटी मिल जाती है, अपनापन नहीं
    यहां खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। समय पर दवा भी मिल जाती है। सभी लोग सम्मान से बात करते हैं। फिर भी रात को जब कमरे में अकेला होता हूं तो घर की याद आती है। बच्चों से कोई शिकायत नहीं, बस इतना चाहता हूं कि कभी आकर गले लगा लें। पिता फूल सिंह

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