
आज फादर्स डे… इंदौर के 10 वृद्धाश्रमों में रहने को मजबूर, 465 से अधिक मामले कलेक्टर कार्यालय में भरण-पोषण के चल रहे
इन्दौर। जिस पिता (father) ने अपने बच्चों (children) की हर जरूरत पूरी करने के लिए जिंदगी भर संघर्ष किया, वही पिता आज अपने बुढ़ापे में दो वक्त की रोटी और अपनापन पाने के लिए वृद्धाश्रम (Old Age Home) का दरवाजा खटखटा रहा है, जिस हाथ ने बेटे की उंगली पकडक़र चलना सिखाया, जिस कंधे पर बैठाकर मेले, बाजार और दुनिया दिखाई, उसी पिता के लिए आज घर में जगह नहीं बची। फादर्स-डे पर यह तस्वीर समाज के सामने कई सवाल खड़े करती है। इंदौर में संचालित हो रहे 10 से ज्यादा वृद्धाश्रम में 400 से अधिक पिता निवास करते हैं, जो अभी अपने बच्चों और पोते से मिलने की तड़प लेकर जैसे-तैसे जिंदा है। वही 465 ऐसे मामले भी विभिन्न अनुभागीय अधिकारियों के समक्ष अपने बेटों से भरण पोषण की गुहार कर रहे हैं।
उनकी बस इतनी सी है चाहत… एक बार पूछ ले पापा आप कैसे हो
बेटा चला गया, अब फोन भी कम आता है
मैंने बेटे को अच्छी पढ़ाई कराई। घर बेचकर उसे पढ़ाया। शुरू में हर सप्ताह फोन आता था, फिर महीने में एक बार और अब कई-कई महीने गुजर जाते हैं। जब तबीयत बिगड़ी तो पड़ोसियों ने मुझे वृद्धाश्रम पहुंचाया। यहां लोग अपने हैं, लेकिन बेटे की आवाज आज भी कानों में गूंजती है। फादर्स-डे पर बस इतना चाहता हूं कि वह एक बार कह दे- पापा आप कैसे हैं?
बहू ने कहा- अब सेवा नहीं कर सकते
पूरी जिंदगी नौकरी की, बच्चों को पढ़ाया, शादी कराई। शरीर थकने के बाद लगा अब परिवार के साथ समय बिताऊंगा, लेकिन धीरे-धीरे मैं घर में बोझ बन गया। एक दिन साफ कह दिया गया कि अब हमारी सेवा करना संभव नहीं। डेढ़ महीने से ब्रिज के नीचे पड़ा रहा कलेक्टर ने मुझे वृद्धाश्रम पहुंचा दिया। यहां सम्मान मिलता है, लेकिन अपना घर कभी नहीं भूलता।
पोते की हंसी याद आती है
हर शाम पोते को पार्क घुमाने ले जाता था। उसके साथ खेलता था। आज कई साल हो गए उसे देखा नहीं। वह बड़ा हो गया होगा। शायद उसे मेरा चेहरा भी याद न हो। वृद्धाश्रम में बच्चे जब मिलने आते हैं तो पोते की याद और ज्यादा सताती है। पिता रमेश ग़ोयल
रोटी मिल जाती है, अपनापन नहीं
यहां खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। समय पर दवा भी मिल जाती है। सभी लोग सम्मान से बात करते हैं। फिर भी रात को जब कमरे में अकेला होता हूं तो घर की याद आती है। बच्चों से कोई शिकायत नहीं, बस इतना चाहता हूं कि कभी आकर गले लगा लें। पिता फूल सिंह
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