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3 साल 3 माह बाद मिला न्याय:स्टार हेल्थ इंश्योरेंस को दावा राशि, ब्याज, मुआवजा देने का आदेश

July 06, 2026

  • उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसला, ब्लैकलिस्टेड अस्पताल बताकर क्लेम ठुकराना सेवा में कमी माना

जबलपुर। स्वास्थ्य बीमा का दावा केवल इस आधार पर खारिज करना कि मरीज ने जिस अस्पताल में इलाज कराया वह बीमा कंपनी की सूची में नहीं था, अब स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी पर भारी पड़ गया। करीब 3 वर्ष 3 माह चली कानूनी लड़ाई के बाद जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग क्रमांक-2, जबलपुर ने बीमा कंपनी को परिवादी का दावा स्वीकार करते हुए 50,836 की उपचार राशि पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक कष्ट के लिए 5,000 तथा वाद व्यय के लिए 2,000 का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने आदेश की तिथि से 45 दिनों के भीतर भुगतान करने के निर्देश भी दिए हैं।



  • 2015 से लगातार नवीनीकृत कर रहे थे पॉलिसी
    परिवादी जितेंद्र गुप्ता ने वर्ष 2015 में स्टार हेल्थ इंश्योरेंस की फैमिली हेल्थ ऑप्टिमा प्लान पॉलिसी खरीदी थी और उसका नियमित नवीनीकरण भी कराते रहे। 4 फरवरी 2023 को अचानक उन्हें सांस लेने में गंभीर तकलीफ हुई। अस्पताल जाते समय रास्ते में वे बेहोश हो गए, जिसके बाद उनके भाई ने उन्हें तत्काल अपेक्स अस्पताल में भर्ती कराया। परिजनों ने इलाज शुरू होने के 24 घंटे के भीतर बीमा कंपनी को क्लेम की सूचना भी दे दी।

    अस्पताल ब्लैकलिस्टेड है कहकर ठुकरा दिया क्लेम
    इलाज के बाद जब बीमा दावा प्रस्तुत किया गया तो स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि जिस अस्पताल में इलाज कराया गया, वह कंपनी की ब्लैकलिस्ट में शामिल है। परिवादी ने 17 मार्च 2023 को विस्तृत शिकायत भेजी और बाद में अपने अधिवक्ता शिवम गुप्ता के माध्यम से 14 जून 2023 को विधिक नोटिस भी भेजा, लेकिन कंपनी ने अपना निर्णय नहीं बदला।

    उपभोक्ता आयोग की शरण में पहुंचे
    बीमा कंपनी से राहत नहीं मिलने पर जितेंद्र गुप्ता ने अपने अधिवक्ता शिवम गुप्ता के माध्यम से जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग, जबलपुर में परिवाद दायर किया। सुनवाई के दौरान परिवादी की ओर से तर्क दिया गया कि आपातकालीन स्थिति में मरीज को किसी भी अस्पताल में तत्काल उपचार लेने का अधिकार है। वहीं बीमा कंपनी ने आयोग से अनुरोध किया कि यदि दावा स्वीकार किया जाए तो पॉलिसी की शर्तों के अनुसार कटौती करने की अनुमति दी जाए।

    आयोग ने बीमा कंपनी की दलील खारिज की
    आयोग ने बीमा कंपनी की इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि कटौती की अनुमति दी जाती है तो परिवादी को शेष राशि के लिए दोबारा आयोग की शरण लेनी पड़ेगी, जिससे न्याय मिलने में अनावश्यक विलंब होगा और न्याय का उद्देश्य ही प्रभावित होगा। आयोग ने स्पष्ट माना कि बीमा कंपनी ने बिना उचित आधार के दावा निरस्त किया, जो उपभोक्ता के प्रति सेवा में कमी की श्रेणी में आता है।

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