
इंदौर। धार भोजशाला विवाद (Dhar Bhojshala dispute) की सुनवाई के दौरान गुरुवार को अदालत में बहस ने तीखा मोड़ ले लिया। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) ने आक्रामक पैरवी करते हुए कई ऐसे दस्तावेज और ऐतिहासिक तथ्य पेश किए, जिनसे वर्षों से चले आ रहे दावों पर सीधा सवाल खड़ा हो गया। उनका दावा है कि धार पर पहला हमला गुजरात के सोलंकी शासकों (Solanki rulers of Gujarat) ने किया था। इसके साथ ही वाग्देवी प्रतिमा को लेकर भी नया दावा किया है।
धार को पहले गुजरात के सोलंकी शासकों ने तहस-नहस किया
अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लिखे गए ब्रिटिश म्यूजियम के पत्र और लेखक रामसेवक गर्ग की पुस्तक का हवाला देते हुए दावा- “धार को पहले गुजरात के सोलंकी शासकों ने तहस-नहस किया था, जबकि मुस्लिम शासकों ने उजड़े ढांचे को फिर से व्यवस्थित किया।”
वाग्देवी प्रतिमा पर भी पेश किया नया दावा
मुस्लिम पक्ष ने अदालत में जोर देकर कहा- “जिस प्रतिमा को वाग्देवी (सरस्वती) बताकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह दरअसल जैन समाज से जुड़ी “अंबिका” देवी की प्रतिमा है।” इस दावे के समर्थन में ब्रिटिश म्यूजियम के पत्र को अहम साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया, जिससे पूरे विवाद की बुनियाद पर ही सवाल उठने लगे हैं।
ASI ने धार पर बताया केंद्र का अधिकार
याचिकाकर्ता अब्दुल समद ने कहा कि इन दस्तावेजों से यह साफ होता है कि इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और अब सच्चाई सामने आ रही है। वहीं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अविरल विकास खरे ने पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि भोजशाला परिसर 1904 से संरक्षित स्मारक है और इस पर केंद्र सरकार का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने दो टूक कहा कि इस स्थल पर किसी भी प्रकार का निजी दावा कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकता।
मुस्लिम पक्ष को कब सौंपी जाएगी वीडियोग्राफी
अदालत में दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस के बीच न्यायालय ने सभी पक्षों को एएसआई सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। यह वीडियोग्राफी 27 अप्रैल को मुस्लिम पक्ष को सौंपी जाएगी, जिसके बाद इस बहुचर्चित और संवेदनशील मामले में अगली सुनवाई और भी निर्णायक मानी जा रही है।
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