
जम्मू। 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले (Pahalgam Terrorist Attack) को एक साल बीत चुका है, लेकिन उस दर्दनाक दिन की यादें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। इस दिन पहलगाम की बायसरन घाटी (Baisaran Valley) में हंसी-खुशी का माहौल अचानक चीख-पुकार में बदल गया था। 26 लोगों की मौत और कई परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। वक्त जरूर बीता, लेकिन जख्मों की टीस अब भी कम नहीं हुई है।
बेटे की याद में हौसले से जी रहे माता-पिता
कानपुर के संजय द्विवेदी और सीमा द्विवेदी अपने बेटे शुभम को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि शुभम को घूमने का बहुत शौक था, लेकिन बायसरन की यात्रा उसकी आखिरी यात्रा बन गई। उन्होंने बताया कि आतंकियों ने सबसे पहले बेटे को निशाना बनाया। दुख के बावजूद परिवार ने हिम्मत नहीं हारी। संजय कहते हैं कि उन्होंने संकल्प लिया है कि शुभम ही नहीं, बल्कि इस हमले में जान गंवाने वाले सभी लोगों की यादों को जिंदा रखेंगे। उनकी बहू ऐशन्या ने भी इस कठिन समय में परिवार को संभाला और हर जिम्मेदारी निभाई।
“आज भी सुनाई देती है बेटे की आवाज”
लेफ्टिनेंट विनय नरवाल के पिता राजेश नरवाल बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से देश सेवा से जुड़ा रहा है। बेटे के जाने का दर्द आज भी उतना ही गहरा है। उनके बुजुर्ग माता-पिता कहते हैं कि उन्हें आज भी अपने पोते की आवाज सुनाई देती है। विनय नरवाल की शहादत के बाद उनकी पत्नी हिमांशी ने खुद को संभालते हुए अपने करियर को आगे बढ़ाने का फैसला लिया। परिवार का कहना है कि यादें कभी खत्म नहीं होतीं, लेकिन अब जिम्मेदारियों के साथ जीना ही एकमात्र रास्ता है।
एक वीडियो और फिर टूट गई दुनिया
हमले के दिन का जिक्र करते हुए अमित परमार बताते हैं कि दोपहर में एक वीडियो के जरिए उन्हें अपने भतीजे सुमित की झलक मिली। शुरुआत में सिर्फ हमले की खबर थी, लेकिन शाम होते-होते भाई यतीश परमार और भतीजे की मौत की पुष्टि हो गई। अमित कहते हैं कि उस वक्त परिवार को यह खबर देना सबसे मुश्किल काम था। उनके पिता बुजुर्ग हैं और यह सदमा पूरे परिवार को तोड़ गया। आज भी उनकी भाभी काजल बेन उस घटना को याद कर सिहर उठती हैं।
दर्द के साथ जीना, हौसले के साथ आगे बढ़ना
हमले के बाद कई परिवारों ने अपने-अपने तरीके से इस दुख से उबरने की कोशिश की। कोई सेवा कार्यों में जुट गया, तो कोई अपनों की यादों को ही सहारा बनाकर जी रहा है। परिजनों का कहना है कि ऐसी घटनाओं से सबक लेने की जरूरत है। खासकर पर्यटन स्थलों की सुरक्षा को और मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हो सकें।
एक साल बाद भी गूंजती हैं वो आवाजें
हमले की भयावह यादें आज भी लोगों के मन में ताजा हैं। परिजनों के अनुसार, उस दिन की आवाजें, दृश्य और दर्द भुलाए नहीं भूलते। एक साल बाद भी यही सवाल है क्या ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है? परिवारों की उम्मीद है कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और ठोस कदमों से आने वाले समय में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।
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