ब्‍लॉगर

संसद में निवाला अब बिना इमदाद..!

– ऋतुपर्ण दवे

अब माननीयों और आम लोगों में कम से कम खाने को लेकर जो फर्क था वो खत्म हो जाएगा। फाइव स्टार कल्चर जैसी सहूलियतों के सुविधाभोगी हमारे माननीय सांसदों को संसद भवन में चल रही कोई आधा दर्जन कैण्टीन में लजीज, जायकेदार, चटखारे लगाकर खाए जाने वाली महंगी डिश अबतक 75 फीसदी तक सस्ती मिलती थी। बड़े होटलों में परोसे जाने वाले शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजनों का सांसदों को बाजार दाम के मुकाबले केवल 25 फीसदी दाम चुकाना पड़ता था। सच में ऐसा लगता था कि यह सरासर नाइंसाफी है और जनता के टैक्स से चुकाए पैसों का बेजा इस्तेमाल भी। अब ऐसा नहीं होगा। माननीयों को संसद के गलियारे में बनी शानदार वातानुकूलित कैण्टीन में खाने के लिए पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा जेब ढीली करनी होगी।

बीते सत्र तक कितना फर्क था। जनता को बाजार दाम पर मंहगी थाली का इंतजाम करना पड़ता था जबकि उसके द्वारा लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में भेजे गए माननीयों को उसी लजीज थाली पर इतनी सब्सीडी मिलती थी कि सुनकर ही आम लोगों का पेट भर जाता। यदि आरटीआई से आई जानकारी से हो-हल्ला नहीं मचता। सुकून इसी बात यह है कि मंहगाई और सब्सीडी पर मंथन करने वाली संसद के सदस्यों को भी लगने लगा था कि यह गलत है। दो साल पहले भी यह बात उठी थी।लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी को भी लगा कि यह गलत है। सभी दलों के सदस्यों ने इसपर एक राय बनाई और फौरन कैण्टीन के खाने पर मिलने वाली सब्सीडी को खत्म करने पर मुहर लगाई थी। अब इसी 29 जनवरी से सांसदों को संसद के बजट सत्र के दौरान कैंटीन में मिलने वाले लजीज खाने की कीमत उसकी लागत यानी बाजार के हिसाब से चुकानी होगी।

जहां आम आदमी मंहगी दाल खाने को मजबूर है, वहीं सांसदों को माली मदद कहें या सरकारी इमदाद जो भी, 13 रुपए 11 पैसे लागत वाली फ्राइड दाल केवल 4 रुपए में मिल चुकी है। सब्जियां वो भी महज 5 रुपए में तो मसाला दोसा 6 रुपए में, फ्राइड फिश और चिप्स 25 रुपए में। मटन कटलेट 18 रुपए में, मटन करी 20 रुपए में और 99.04 रुपए की नॉनवेज थाली सिर्फ 33 रुपए में। एक आरटीआई के जवाब में 2017-18 में जो रेट लिस्ट सामने आई थी उसे देखकर आम आदमी भौंचक्क रह गया। इसमें चिकन करी 50 रुपए में तो शाकाहारी थाली 35 रुपए में परोसी जाती थी। जबकि थ्री कोर्स लंच केवल 106 रुपए में मिलता था। यदि सांसदों की थाली को मिलने वाले सरकारी इमदाद का जोड़-घटाव किया जाए तो माननीयों को मदद का आंकड़ा कम से कम 63 प्रतिशत और अधिकतम 75 प्रतिशत तक जा पहुंचता है।

इस सच का दूसरा पहलू भी है। कुछ साल पहले जब आम आदमी की जरूरत की गैस भी कोटा सिस्टम में आ गई। साल भर में केवल 12 गैस सिलेण्डर ही सरकारी इमदाद से एक परिवार को मिलने का दौर शुरू हुआ। तब इन्हीं लाखों आम भारतीयों ने लोकलुभावन विज्ञापन और प्रधानमंत्री के प्रेरक उद्बोधनों से वशीभूत हो सरकारी इमदाद यानी सब्सीडी छोड़ने की होड़ लगा दी थी। यकीनन यही हिन्दुस्तान की खासियत है जो आवाम इतनी भावुक और मेहरबान हुई कि पहली ही अपील के बाद एक झटके में साढ़े 5 लाख लोगों से ज्यादा ने गैस पर सब्सिडी छोड़ दी और इससे सरकार पर 102.3 करोड़ रुपये का बोझ कम हुआ। समय के साथ यह जरूरी भी था और देश के विकास के लिए अहम भी। 

सवाल उस वक्त भी उठते रहे कि जब हमारा सबसे बड़ा नुमाइन्दा ही 100 रुपए का खाना 25 रुपए में खाने पर शर्मिन्दा नहीं है वह भी तब जब उसे पगार, दूसरे भत्तों और तमाम सुविधाओं के नाम पर हर महीने डेढ़-दो लाख रुपए से भी ज्यादा की आमदनी या बचत होती है तो गैस का उपयोग करने वाले औसत आय वालों जिनमें दिहाड़ी मजदूर और झोपड़पट्टी में रहने वाले गरीब भी हैं, उनसे सब्सीडी छोड़ने की अपील? आखिर माननीयों को भी यह समझ आई। खुद ही आगे बढ़कर संसद की कैण्टीन के निवाले पर मिलने वाली सरकारी इमदाद को छोड़ने का फैसला जो कर लिया वो बेहद सराहनीय है।

संसद की कैण्टीन में सब्सीडी को लेकर मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान एक आरटीआई से खुलासे के बाद 2015 में ही सदन में खूब बहस हुई थी। लेकिन संसद की खाद्य मामलों की समिति के तत्कालीन अध्यक्ष जीतेन्द्र रेड्डी ने सब्सिडी हटाने की संभावना को खारिज कर दिया। उसी दौरान तत्कालीन ससंदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू को भी ये अच्छी बहस का विषय जरूर लगा था। कुछ सांसद तो भलमनसाहत में यह भी कह गए कि हम सब्सिडी छोड़ने को तैयार हैं।

यहां यह भी गौर करना होगा कि उसी साल 2 मार्च 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एकाएक संसद की कैण्टीन के कमरा नं. 70 जा पहुँचे। जो तैयार था उसी से उनके लिए शाकाहारी थाली लाई गई जिसमें रोटी, चावल, दाल, सब्जी के रूप में साग, राजमा और रायता था और कीमत कुल 18 रुपये। प्रधानमंत्री ने खाने से पहले सूप भी मंगवाया जिसकी कीमत 8 रुपये और सलाद जिसकी कीमत 3 रुपये थी। इस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने तब कुल मिलाकर 29 रुपये का बिल चुकाया और संसद की कैण्टीन में पहुँचने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। वहाँ उन्होंने विजिटर बुक में ‘अन्नदाता सुखी भव’ लिखा। हो सकता है कि तभी उनके दिमाग भी यही बात कौंधी हो कि जनता के टैक्स से जुटाए गए पैसों से सांसदों को खाने में सब्सीडी कैसी? इसके बाद यह मामला खूब चर्चाओं में रहा जिसकी आखिरी परिणिति अब सामने है।

संसद की कैण्टीनों को साल 2009-10 में 10.46 करोड़, साल 2011-12 में 12.52 करोड़, 2013-14 में 14 करोड़ 9 लाख रुपए की सब्सिडी दी गई। इन कैण्टीनों में सांसदों के अलावा करीब 9000 कर्मचारी भी खाते हैं उनमें भी 85 से 90 फीसदी आयकर दाता हैं। संसद की कैण्टीनों को साल 1952 से सब्सिडी देने का सिलसिला शुरू हुआ है। लेकिन इसपर हाय-तौबा सुभाष अग्रवाल की आरटीआई खुलासे के बाद हुआ और 2 मार्च 2015 में प्रधानमंत्री के वहाँ पहुँचने के बाद से ही यह जब-तब गरमागरम बहस का मुद्दा बनता रहा। अब 19 जनवरी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने इस बात की घोषणा कर ही दी कि संसद की कैण्टीन को मिलने वाली सब्सिडी पूरी तरह से रोक दी गई है। संसद की कैंटीन व्यवस्था उत्तर रेलवे की जगह फाइव स्टार होटल अशोका का संचालन करने वाली सरकारी कंपनी भारतीय पर्यटन विकास निगम लिमिटेड यानी आइटीडीसी को सौंपी जा चुकी है। जिसके खानपान की दर रेलवे की पुरानी कैंटीन से काफी ज्यादा है। इस सब्सिडी के खत्म होने से लोकसभा सचिवालय को हर साल लगभग 8 से 10 करोड़ रुपये की बचत होगी।

निश्चित रूप से तमाम सुविधाभोगी और एक ही कार्यकाल में उम्र भर पेंशन की सुविधा के पात्र सांसदों को ऐसी सब्सिडी तब शोभा भी नहीं देती थी जब देश के निजी सेक्टर में न तो पेंशन की सुविधा है न बाद रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारियों की कोई पूछ परख। हालांकि सरकारी क्षेत्र में भी नई और पुरानी पेशन स्कीम को लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं। ऐसे में सांसदों की कैण्टीनों में सब्सिडी रोका जाना सराहनीय कदम है और कह सकते हैं कि देर आयद दुरुस्त आयद।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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