इंदौर न्यूज़ (Indore News) मध्‍यप्रदेश

5 हजार के इलाज का खर्च मरीजों की लापरवाही से 15 लाख में

  • साधारण टीबी 5000 रुपये में ठीक हो जाती है मगर इलाज बीच में रोकने से टीबी की सेकंड स्टेज का शिकार हो रहे हैं मरीज
  • चलता इलाज रोकने से परेशानी…दूसरी गलती मौत को निमंत्रण

इंदौर, प्रदीप मिश्रा । वैसे तो भारत (India) से तपेदिक यानी टीबी (TV) की बीमारी का लगभग सफाया हो चुका है, लेकिन यदि यह बीमारी अब भी भारी है तो उन लोगों की लापरवाही पर जो चलते इलाज को बीच में छोड़ देते हैं और यह लापरवाही खुद उन पर ही नहीं, बल्कि सरकार (government) पर भी कई गुना भारी पड़ती है । जो टीबी (TV) की बीमारी महज 5 हजार रुपये में ठीक हो जाती है, वही मरीज द्वारा दवाइयां लेने में की जा रही लापरवाही के चलते मरीज गंभीर टीबी के संक्रमण का शिकार हो जाता है और उसके इलाज (Treatment ) पर सरकार को २ लाख से लेकर 15 लाख रुपये तक खर्च करना पड़ते हैं, क्योंकि टीबी के मरीजों (Patient) का इलाज सरकारी खर्च पर होता है, लेकिन महंगे इलाज के बावजूद कई बार लापरवाही का हर्जाना मरीज को अपनी जान तक गंवाकर चुकाना पड़ता है। यह खुलासा टीबी मरीजों के इलाज के दौरान हुई मेडिकल (Medical) जांचों व दी जाने वाली दवाइयों की कीमतों से हुआ है।

टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय छजलानी के अनुसार टीबी के मरीजों को अपना इलाज (Treatment) निरंतर करना आवश्यक होता है। सामान्य टीबी का इलाज लगातार 6 माह तक किया जाता है, लेकिन मरीज एक माह तक दवाइयां लेने के बाद स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगता है और डोज पूरा नहीं करते हुए या तो इलाज को छोड़ देता है या लापरवाही करते हुए कभी दवाइयां लेता है और कभी नहीं। मरीज की इस लापरवाही के कारण टीबी का संक्रमण और गंभीर होकर उभरता है, जिसके इलाज में लाखों रुपए खर्च हो जाते हैं। सरकार सारे देश को वर्ष 2025 तक टीबी (TV) मुक्त करना चाहती है। इसके लिए हर साल टीबी मरीजों की नि:शुल्क मेडिकल जांचों व दवाइयों पर करोड़ो रुपये खर्च किए जा रहे हैं। टीबी मरीज को इस बीमारी से मुक्त होने के लिए नियमित मेडिकल जांच कराना पड़ती है तो वहीं डाक्टर की सलाह मानते हुए हर रोज दवाइयों का डोज लेना पड़ता है। इसके अलावा सिगरेट, बीड़ी, शराब, गांजा, भांग सहित हर नशे से दूर रहना पड़ता है।


दो प्रकार की होती है टीबी बीमारी
टीबी विशेषज्ञ डाक्टरों के अनुसार टीबी की बीमारी दो प्रकार की होती है। एक साधारण टीबी, दूसरी जानलेवा एमडीआर टीबी । मरीज को लगातार खांसी चलने, बार-बार बुखार आने पर इस बीमारी के लक्षण उभरते हैं। इसके बाद मरीज के खखार व छाती की जांच की जाती है। इन जांचों से बीमारी की गंभीरता का पता चलता है, जिसमें साधारण टीबी से लेकर गंभीर बीमारी के रूप में मल्टी ड्रग रेजीटेन्स का पता चलता है। सामान्य टीबी का मरीज नियमित जांचें व इलाज सहित बताए गए परहेज कर सिर्फ ६ माह में इस बीमारी से निजात पा सकता है । मगर कई बार मरीजों की मनमानी व अधूरा इलाज के चलते उनकी यही साधारण टीबी, जानलेवा एमडीआर टीबी में तब्दील हो जाती है।

एक टेबलेट की कीमत 7000 रुपये
टीबी के मरीजों का महीनों तक होने वाले इलाज व मेडिकल जांचों का सारा खर्चा सरकार उठाती है। साधारण टीबी का इलाज तो मात्र 5 हजार रुपये की दवाइयों में हो जाता है, मगर जब यह बीमारी गंभीर रूप धारण कर एमआरडी टीबी में तब्दील होती है तो मरीज को बेडक्विलिन टेबलेट नियमित हर रोज लेना पड़ती है, जिसकी कीमत लगभग 7000 रुपये होती है। जो मरीज को नियमित लेना पड़ती है। इस प्रकार से सिर्फ दवाइयों पर ही सरकार लगभग 13 लाख रुपये तो वहीं मेडिकल जांचों पर लगभग 2 लाख रुपये खर्च करती है।

डायबिटीज वालों को अत्यधिक खतरा
वैसे तो बीड़ी, सिगरेट पीने व तम्बाखू सम्बन्धित नशे का सेवन करने वालों को टीबी बीमारी होने की ज्यादा आशंका बनी रहती है, मगर डायबिटीज यानी शुगर वाले मरीजों को टीबी होने की संभावना ज्यादा होती है, क्योंकि शुगर वाले मरीजों की प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर हो जाती है। इस कारण टीबी इन्हें आसानी से चपेट में ले लेती है। इसके अलावा कोरोना संक्रमण काल के बाद जो मरीज ठीक हो चुके हैं, उन्हें विशेष सावधानी बरतना होगी, क्योकि कोरोना वायरस फेफड़ों के अलावा शरीर के कई अंगों को बहुत ज्यादा कमजोर कर देता है।

इंदौर जिले में हर साल 200 मौत
किस शहर व जिले में दोनों प्रकार की टीबी के कितने मरीज है। कितने ठीक हो चुके हैं। कितनों की इलाज के दौरान मृत्यु हुई। इसका सारा रिकार्ड सरकार सम्हाल कर रखती है। डाक्टरों के अनुसार सरकारी व निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले टीबी मरीजों की संख्या लगभग 20 हजार है। हर साल जिले में लगभग 200 टीबी मरीजों की मौत हो जाती है।

टीबी मरीज शराब भूलकर भी न पीएं
टीबी मरीजों के लिए शराब जहर से ज्यादा खतरनाक साबित होती है। डाक्टरों का कहना है कि मरीजों को इलाज के दौरान जो दवाइयां दी जाती हंै, वह बेहद गर्म होती है, जो मरीज के लीवर सहित अन्य अंगों पर अत्यधिक प्रभाव डालती है। शराब पीने से टीबी के मरीज को पीलिया हो जाता है, जिसके कारण लीवर डैमेज हो जाता है, फिर मरीज की मृत्यु हो जाती है।

इलाज कभी अधूरा न छोड़े
कई दिनों तक लगातार खांसी व बार-बार बुखार आने के लक्षण महसूस होते ही तुरन्त डाक्टर की सलाह ले कर अपने बलगम यानी खखार की जांच व सीने का एक्सरे कराएं। जांच से टीबी साबित होते ही 6 माह तक हर रोज नियमित दवाइया लेते रहें। भूल कर भी इलाज अधूरा न छोड़ें। वरना जिंदगी खतरे में पड़ सकती है।

-डाक्टर विजय छजलानी, टीबी विशेषज्ञ इंदौर

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