
इंदौर। निगम के बहुचर्चित फर्जी बिल महाघोटाले में ईडी ने कल मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े 32 आरोपियों के खिलाफ 30 हजार से अधिक पन्नों की अभियोजन शिकायत दायरकर दी। इसके पूर्व पुलिस द्वारा भी चार्जशीट दाखिल की गई है, तो ईडी ने छापामार कार्रवाई के अलावा आरोपियों की अचल और अन्य सम्पत्तियों को भी जब्त किया है। इन जादूगरों ने नगर निगम खजाने को तो चूना लगाया ही, साथ ही 40 करोड़ रुपए से अधिक की फर्जी खरीदी दिखाकर जीएसटी डकैती भी कर डाली, जिसकी जांच वाणिज्य कर विभाग की जीएसटी शाखा ने डाटा एनालासिस के आधार पर पिछळे दिनों की थी। कागजों पर खरीदी कर उसका इनपुट टैक्स क्रेडिट इन ठगोरी कम्पनियों ने जीएसटी पोर्टल पर दिखा डाला।
नगर निगम ने ही सबसे पहले एमजी रोड थाने पर इस फर्जी बिल घोटाले की शिकायत दर्ज करवाई। शुरुआत में अंदेशा नहीं था कि सुरसा के मुंह की तरह यह फर्जीवाड़ा बढ़ता जाएगा और 400 से अधिक बोगस फाइलें निगम ने ही अपनी जांच में पकड़ी है। अग्रिबाण शुरू से ही महाघोटाले का विस्तृत खुलासा करता रहा। यहां तक कि प्रकाशित खबरों के आधार पर ही पुलिस को मदद भी मिली और ठगोरी कम्पनियों के साथ निगम के दोषी इंजीनियरों की चल-अचल सम्पत्तियों की जानकारी भी प्राप्त हुई। दूसरी तरफ शासन ने हाईपॉवर कमेटी का भी हल्ला मचाया और तीन घंटे तक निगम मुख्यालय आकर कमेटी के आला अफसरों ने जांच-पड़ताल की, उसके बाद यह कमेटी कहां सो गई, किसी को पता ही नहीं चला और आज तक कमेटी ने ना तो आगे की जांच की और ना ही अपनी कोई रिपोर्ट प्रस्तुत की।
इस बारे में शासन का भी कहना है कि पुलिस के बाद ईडी जैसी केन्द्रीय एजेंसी जब इस पूरे मामले की जांच कर रही है तो अब उसमें अब शासन का रोल बचता भी नहीं है, क्योंकि यह आपराधिक प्रकरण है, जिसकी जांच इस तरह की एजेंसियां ही बेहतर तरीके से कर सकती हैं। कल ईडी ने जो चार्जशीट दायर की, उनके आरोपियों में ठेकेदार लाभार्थी, इंदौर नगर निगम के अधिकारी, स्थानीय निधि लेखा परीक्षा/रेजिडेंट ऑडिट कार्यालय के अधिकारी तथा अन्य निजी व्यक्ति शामिल हैं, जिन्होंने अपराध से अर्जित धन को छिपाने, रखने, विभिन्न माध्यमों से स्थानांतरित करने और उपयोग करने में सहायता की। ईडी ने जांच की शुरुआत थाना एम.जी. रोड, इंदौर में दर्ज कई एफआईआर के आधार पर की। इन मामलों में फर्जी बिल, जाली कार्यादेश (वर्क ऑर्डर), फर्जी माप पुस्तिकाएं, झूठे पूर्णता प्रमाणपत्र, हेरफेर की गई नोटशीट और अन्य जाली दस्तावेजों के माध्यम से नगर निगम के कोष से सरकारी धन की धोखाधड़ीपूर्ण निकासी का आरोप है। जिन कार्यों के लिए भुगतान किया गया, वे या तो कभी किए ही नहीं गए थे अथवा पहले ही वास्तविक कार्यादेशों के तहत पूरे किए जा चुके थे। जांच में सामने आया कि कई आरोपी ठेकेदार फर्मों ने इंदौर नगर निगम तथा स्थानीय निधि लेखा परीक्षा/रेजिडेंट ऑडिट कार्यालय के अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर फर्जी कार्यादेश फाइलें और फर्जी बिल तैयार किए।
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