
नई दिल्ली। लगभग 19 वर्ष बाद कोलकाता (Kolkata) लौटीं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन (Taslima Nasreen) ने कहा कि उनकी वापसी इस बात का प्रतीक है कि अन्याय लंबे समय तक रह सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। कोलकाता में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में किसी लेखक को अपने विचार रखने के कारण अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
तसलीमा ने कहा कि कोलकाता लौटकर उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है, मानो वह अपने जीवन के उसी हिस्से में वापस आ गई हों, जिसे वर्षों पहले यहीं छोड़कर जाना पड़ा था। उन्होंने कहा कि उनका सपना है कि किसी भी लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत निर्वासन के रूप में न चुकानी पड़े।
‘मैं राजनीति नहीं, महिलाओं के अधिकारों की बात करने आई हूं’
अपने संबोधन में तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध के लिए कार्यक्रम में शामिल नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य केवल महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपनी बात रखना है।
उन्होंने कहा कि यूरोप ने उन्हें नागरिकता और रहने की जगह दी, लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उन्हें स्थायी रूप से रहने का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार, किसी अदालत ने उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया, फिर भी कट्टरपंथियों के विरोध के कारण उन्हें निर्वासन झेलना पड़ा।
सरकार ने सुरक्षा का दिया आश्वासन
रवींद्र सदन में आयोजित कार्यक्रम में राज्य सरकार की ओर से तसलीमा नसरीन का स्वागत किया गया। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि जब भी वह पश्चिम बंगाल आएंगी, उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
2007 में छोड़ना पड़ा था कोलकाता
तसलीमा नसरीन वर्ष 2004 से 2007 के बीच कोलकाता में रहीं। उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ अंशों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था। कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए नवंबर 2007 में उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा।
इससे पहले 1994 में बांग्लादेश में लेखन को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों से मिली धमकियों के बाद उन्होंने अपना देश छोड़ दिया था और तब से निर्वासन का जीवन जी रही हैं।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved