
नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के एक बयान ने फ्रांस की राजनीति, इमिग्रेशन और धार्मिक पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी है. ट्रंप ने कहा है कि पेरिस (Paris) बहुत जल्द एक ‘मुस्लिम शहर’ (‘Muslim city’) बन जाएगा. उन्होंने फ्रांस (France) के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आव्रजन नीति की तीखी आलोचना की है. ट्रंप ने आरोप लगाया है कि दुनिया भर से लोगों को आने देने की नीति फ्रांस के लिए बड़ी गलती साबित हुई है.
राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब फ्रांस में महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी नाराजगी के बीच प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं. यही नहीं वहां छात्रों का भी हिंसक प्रदर्शन हो रहा है. ये छात्र स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी का आरोप लगा रहे हैं.
अपने ट्रेडमार्क के अनुरुप ट्रंप ने मैक्रों को उपदेश दिया और कहा, “वे दुनिया भर के लोगों को अंदर आने दे रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे फ्रांसीसी राष्ट्रपति को लगभग आठ-नौ साल से जानते हैं और उन्होंने मैक्रों से काफी पहले ही कह दिया था आप एक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं.”
ट्रंप ने फ्रांस को अपने देश का आईना दिखाया और फ्रांस और अमेरिका के इमिग्रेशन पॉलिसी की तुलना की. ट्रंप ने कहा, “हमने अपनी सीमाएं बंद कर दीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.” उन्होंने आगे कहा कि मैक्रों को “बहुत पहले ही अपनी सीमाएं बंद कर देनी चाहिए थीं.”
लेकिन क्या ट्रंप के इस दावे का कोई ठोस जनसांख्यिकीय आधार है? क्या पेरिस वास्तव में मुस्लिम बहुल शहर बनने की दिशा में बढ़ रहा है, क्या सोशल मीडिया के वीडियो, तस्वीरों भर से यह कह देना सही है. या ट्रंप का यह बयान फ्रांस में आव्रजन को लेकर जारी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा है? इसे समझने के लिए फ्रांस की आबादी, धर्म और मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को अलग-अलग देखना जरूरी है.
गौरतलब है कि ट्रंप अपने बयानों की अस्थिरता और तथ्यों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने के लिए जाने जाते हैं.
क्या पेरिस में मुसलमान बहुसंख्यक हो जाएंगे?
राष्ट्रपति ट्रंप के बयान का सबसे विवादास्पद हिस्सा पेरिस के जल्द मुस्लिम शहर बनने का दावा है. फ्रांस में मुस्लिम आबादी निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस दावे की पुष्टि नहीं करते कि देश की राजधानी जल्द मुस्लिम बहुल हो जाएगी.
फ्रांस के राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान INSEE की 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक 2019-2020 में फ्रांस की मुख्य भूमि में 18 से 59 वर्ष की उम्र के लोगों में करीब 10 फीसदी ने खुद को मुस्लिम बताया था. इसी आयु वर्ग में 29 फीसदी लोगों ने खुद को कैथोलिक और 51 फीसदी ने किसी भी धर्म से जुड़ा नहीं बताया. ध्यान रहे कि ये आंकड़े पूरे फ्रांस की उस आयु सीमा के हैं, न कि सिर्फ पेरिस के. इसलिए इन्हें सीधे राजधानी की आबादी का अनुपात नहीं माना जा सकता.
प्यू रिसर्च के अनुसार फ्रांस में मुस्लिम आबादी 8-9% के आस पास है. जबकि कुल संख्या आमतौर पर 5 से 7 मिलियन के आसपास बताई जाती है.
गौरतलब है कि फ्रांस में धर्म के आधार पर आधिकारिक जनगणना नहीं होती, इसलिए मुस्लिम आबादी की सटीक संख्या बताना भी मुश्किल है.
हालांकि पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में उत्तरी अफ्रीका और दूसरे क्षेत्रों से आए प्रवासियों और उनके परिवारों की बड़ी मौजूदगी है. लेकिन किसी शहर में मुस्लिम समुदाय की मौजूदगी और उस शहर का मुस्लिम बहुल हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं.
पेरिस फ्रांस की राजधानी है. इसकी आबादी लगभग 22.2 लाख है. यहां की आबादी का अनुमानित 10-15% हिस्सा मुस्लिम है, यानी लगभग 2,20,000 मुसलमान पेरिस में रहते हैं.
लेकिन अगर पेरिस सबर्ब यानी उपनगर की बात करें तो स्थिति बदल जाती है.
पूरे Île-de-France क्षेत्र यानी कि पेरिस और उपनगर में मुस्लिम आबादी का अनुमान अक्सर 15% या उससे अधिक लगाया जाता है. फ्रांस की कुल मुस्लिम आबादी का करीब एक-तिहाई हिस्सा इसी क्षेत्र में रहता है.
पेरिस के उत्तर-पूर्व में स्थित सीन-सेंट-डेनिस (Seine-Saint-Denis) जैसे कुछ उपनगरों में मुस्लिम समुदाय की आबादी ज्यादा है. कई अनुमान बताते हैं कि यहां मुस्लिम आबादी 30% से 40% के बीच है. यहां नवजात शिशुओं के नामों में अरबो-मुस्लिम नामों का अनुपात बहुत ऊंचा (58–62% तक) है. ये इस बात का संकेत है यहां मुस्लिम आबादी बढ़ रही है.
आम धारणा यह है कि फ्रांस के ज़्यादातर मुसलमान पेरिस और उसके आस-पास के इलाकों में, जिन्हें ‘बनलियू’ कहा जाता है, में रहते हैं.
ये इलाके अमेरिका की ‘पब्लिक हाउसिंग’ परियोजनाओं की तरह हैं. फ्रांसीसी मीडिया अक्सर शहर के बाहरी इलाकों में रहने को इस बात के सबूत के तौर पर पेश करता है कि मुसलमान मुख्यधारा के समाज में घुल-मिल नहीं पाए हैं.
पेरिस में मस्जिदें शहर के बाहरी किनारों पर स्थित हैं, और इनमें से कई मस्जिदों तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट से पहुंचना भी मुश्किल है. दिलचस्प बात यह है कि सिनेगॉग यानी कि यहूदी प्रार्थना-स्थल भी बाहरी इलाकों में ही हैं, लेकिन ये मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम में केंद्रित हैं, जबकि मस्जिदें ज़्यादातर दक्षिण-पूर्व में हैं.
पेरिस में एकमात्र ऐसी मस्जिद जिसे शहर के केंद्र में स्थित माना जा सकता है, वह ‘ग्रैंड मॉस्क ऑफ़ पेरिस’ है. पेरिस में हलाल रेस्तरां और बाज़ारों का मामला काफ़ी दिलचस्प है. पेरिस में ज़्यादातर हलाल रेस्तरां शहर के केंद्र में स्थित हैं और वहां सार्वजनिक परिवहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है; इसके विपरीत हलाल बाज़ार मस्जिदों की तरह ही शहर के बाहरी इलाकों में स्थित हैं.
फ्रांस की राजनीति में धर्म और पहचान का सवाल
फ्रांस का संविधान धर्मनिरपेक्षता यानी लैसिते के सिद्धांत पर आधारित है. यहां राज्य और धर्म को अलग रखने और नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देने पर जोर दिया जाता है. इसके बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक प्रतीकों, हिजाब, आव्रजन और राष्ट्रीय पहचान को लेकर लंबे समय से राजनीतिक बहस चलती रही है.
ट्रंप के बयान को इसी बहस के संदर्भ में देखना चाहिए. फ्रांस में भी दक्षिणपंथ की राजनीति सिर उठाती रहती है. वे इमिग्रेशन पर सख्त रुख को राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा से जोड़ते हैं, जबकि उनके आलोचक कहते हैं कि आर्थिक संकट, सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली और युवाओं की नाराजगी जैसी समस्याओं को केवल प्रवासियों या किसी धर्म के साथ जोड़ना वास्तविक कारणों से ध्यान भटका सकता है.
फिलहाल पेरिस के जल्द मुस्लिम बहुल शहर बन जाने के ट्रंप के दावे के समर्थन में कोई विश्वसनीय जनसांख्यिकीय प्रमाण सामने नहीं है. लेकिन पेरिस के समाज में इस पर गहरे मंथन हो रहा है.
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