नई दिल्ली। देश के पूर्व मुख्य जस्टिस बी आर गवई (Justice B. R. Gavai) ने न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में कॉलेजियम प्रणाली ही भारत के लिए सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। उन्होंने यह भी माना कि यह प्रणाली पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है, लेकिन अब तक के अनुभव के आधार पर इसे बेहतर विकल्प बताया।
यह बात पूर्व CJI ने ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में कही। इस दौरान उन्होंने “न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना” विषय पर बोलते हुए न्यायपालिका, कार्यपालिका और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा की।
‘कोई भी प्रणाली परिपूर्ण नहीं’
जस्टिस गवई ने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कोई भी प्रणाली पूरी तरह परिपूर्ण नहीं होती। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक इसके कामकाज को देखने के बाद उन्हें लगता है कि फिलहाल यही प्रणाली देश के लिए सबसे बेहतर है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम मनमाने ढंग से काम नहीं करता। उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठ न्यायाधीश नाम सुझाते हैं, जिसके बाद प्रक्रिया केंद्र सरकार को भेजी जाती है। विभिन्न एजेंसियों से सुझाव लेने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाता है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि केंद्र सरकार को किसी नाम पर आपत्ति होती है, तो वह कॉलेजियम को वापस भेज सकती है। कॉलेजियम इन आपत्तियों पर विचार कर अंतिम निर्णय करता है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि कॉलेजियम द्वारा दोबारा भेजे गए नामों पर नियुक्ति करना कार्यपालिका की जिम्मेदारी होती है।
उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि कई मामलों में दूसरी सिफारिश के बाद भी नियुक्तियां लंबित हैं। उन्होंने इसे आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा नहीं बताते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रश्न है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है।
जजों के ट्रांसफर और भूमिका पर टिप्पणी
जस्टिस गवई ने न्यायाधीशों के स्थानांतरण पर भी कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई न्यायाधीश बार-बार शीर्ष अदालत के फैसलों की अनदेखी करता है, तो क्या कॉलेजियम को सुधारात्मक कदम नहीं उठाने चाहिए।
कार्यपालिका पर संयम की सलाह
पूर्व CJI ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के संतुलन पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अदालतें हमेशा संयम बरतती हैं, लेकिन जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है या शक्तियों का संतुलन बिगड़ता है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कार्यपालिका किसी व्यक्ति पर केवल संदेह के आधार पर उसका घर ध्वस्त कर देती है, तो क्या न्यायपालिका चुप बैठ सकती है। उन्होंने कहा कि यह कानून के शासन से जुड़ा गंभीर प्रश्न है, जिस पर विचार होना चाहिए।
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