
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें आने वाले महीनों में पैकेटबंद खाने की चीजों, रोजमर्रा के जरूरत की सामान और घरेलू सामानों की कीमतें बढ़ा सकती हैं. माल ढुलाई और कच्चे माल की बढ़ती कॉस्ट से कंज्सूमर सामान बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा कम हो रहा है. टीओआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्यूल की कीमतों में हालिया बदलाव से फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों के लिए लॉजिस्टिक्स, डिस्ट्रीब्यूशन और कच्चे माल की कॉस्ट बढ़ने की उम्मीद है. ये कंपनियाँ पहले से ही 8-10 फीसदी महंगाई के दबाव का सामना कर रही हैं. यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब पिछले साल GST दरों में कटौती के बाद कंज्यूमर डिमांड में सुधार के संकेत दिखने लगे थे, और नेस्ले इंडिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कंपनियों ने चौथी तिमाही में मजबूत कमाई दर्ज की थी.
रिपोर्ट के अनुसार, मैरिको और डाबर इंडिया सहित कई कंपनियों ने बढ़ती लागत की भरपाई के लिए पहले ही कीमतों में 2-5 फीसदी की कंट्रोल बढ़ोतरी लागू कर दी है, और वे आगे और बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही हैं. डाबर इंडिया के ग्लोबल सीईओ मोहित मल्होत्रा ने टीओआई को बताया कि हमने कारोबार के अलग-अलग हिस्सों में पहले ही कीमतों में 4 फीसदी की बढ़ोतरी लागू कर दी है, और आगे हमें कीमतों में एक और बढ़ोतरी के दौर पर विचार करना होगा. उन्होंने आगे कहा कि कंपनी को इस वित्त वर्ष में लगभग 10 फीसदी महंगाई रहने की उम्मीद है.
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज और हिंदुस्तान यूनिलीवर के अधिकारियों ने भी हालिया कमाई की बैठकों (earnings calls) के दौरान संकेत दिया कि अगर महंगाई का दबाव बना रहता है, तो कीमतों में और बढ़ोतरी पर विचार किया जा सकता है. मीडिया रिपोर्ट में पार्ले प्रोडक्ट्स के मुख्य मार्केटिंग अधिकारी मयंक शाह के हवाले से कहा गया है कि कीमतों में बढ़ोतरी अब तय लग रही है, हालांकि इसकी मात्रा पर अभी भी विचार किया जा रहा है. उद्योग विशेषज्ञों ने रिपोर्ट में कहा कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार की बढ़ोतरी के बजाय, कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक रहने वाला उतार-चढ़ाव उपभोक्ता मांग के लिए, विशेष रूप से ग्रामीण बाजारों में, एक बड़ा जोखिम पैदा करता है.
ग्रांट थॉर्नटन भारत में पार्टनर और उपभोक्ता एवं खुदरा उद्योग के प्रमुख नवीन मालपानी ने टीओआई की रिपोर्ट में कहा कि अगर फ्यूल की कीमतें कई तिमाहियों तक ऊंची बनी रहती हैं, तो कंपनियां अंततः कीमतों में नियंत्रित बढ़ोतरी या उत्पादों की मात्रा (grammage) में कमी का सहारा ले सकती हैं, जिससे कंज्यूमर डिमांड में सुधार की गति धीमी पड़ सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, नेस्ले इंडिया के एूडी मनीष तिवारी ने कहा कि हम इन घटनाक्रमों पर बहुत बारीकी से नज़र रख रहे हैं. कीमतों में बदलाव करना हमेशा हमारा आखिरी विकल्प होता है.
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