
किसी संस्थान के साथ 25 साल गुजारना अपने आप में गौरव की अभिव्यक्ति कराता है और फिर ऐसा संस्थान जहां से आपने अपने कॅरियर का ककहरा शुरू किया हो। आज अग्निबाण अपनी 49वीं सालगिरह मना रहा है। अपने शिशुकाल में तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यौवन में पहुंचे अग्निबाण ने यूं ही नहीं लोगों के दिलों पर राज किया। किया क्या? अभी भी कर रहा है। ब्रेकिंग न्यूज के जमाने के साथ सोशल मीडिया पर कदम से कदम मिलाकर चलने वाला हमारा अखबार अग्निबाण आज भी दोपहर की चाय का हिस्सा है। भले ही सोशल मीडिया पर सॉफ्ट कापी आ जाती है, लेकिन एक हाथ में जब तक अग्निबाण पेपर और दूसरे हाथ में चाय का कप नहीं हो, तब तक लोगों की जिज्ञासा शांत नहीं होती। समय के दौर के साथ चलने वाले अग्निबाण ने कभी अपने आपसे समझौता नहीं किया, चाहे वह कोई-सा भी क्षेत्र हो। इसलिए तो हम समय के साथ भी है और समय के बाद भी।
ऐसा नहीं है कि अग्निबाण अपनी पुरानी परंपरा पर चल रहा है, उसकी युवा पीढ़ी ने न्यूज को नए ढंग से परोसने का भी काम शुरू किया है। ब्रेकिंग न्यूज को अग्निबाण चैनल द्वारा सोशल मीडिया पेज पर तुरंत से तुरंत भेजना भी आज हमारा लक्ष्य बन गया है। मुझे गर्व है कि मैं सन् 2000 से इस परिवार का हिस्सा हूं। हिस्से के साथ कई किस्से भी जुड़े हुए हंै, जिनकी प्रस्तुति को शब्दों में पिरोने लगूं तो शायद 16 पेज का अखबार भी कम पड़ जाए। अग्निबाण की शख्सियत ही कुछ ऐसी है। बहुत ही कम समय में वो मुकाम हासिल किया, जिसने मुझे नाम और सम्मान दिया। किसी ख्वाब को देखना और उसे मुकम्मल करने के लिए जी तोड़ मेहनत करना, अगर किसी ने सिखाया तो वो बड़े भैया (राजेश चेलावतजी)। आज जिस मुकाम पर हूं, उस तक पहुंचने के लिए राह दिखाई बड़े भैया ने।
एक तरह से उन्होंने मिट्टी को घड़ा बनाया और इस घड़े की नक्काशी की बापू (स्व. महेंद्र बापनाजी) ने। इन दोनों शख्सियत का जितना गुणगान हो वो कम ही आंका जाएगा। परिवार के दूसरे सदस्यों का प्रेम और काम के लिए प्रोत्साहित करना कोई बड़ी दीदी (मीनाजी खान) से सीखे। अग्निबाण में जो भी आया, उसने सीखा और ऐसा सीखा कि आज वह देश और दुनिया की मीडिया में मशहूर हो गया। बड़े भैया की खरी-खरी पढ़ते-पढ़ते मैंने भी ढोल की पोल, जैसा दिखा-वैसा लिखा और अब वर्तमान में ये पॉलीटिक्स है प्यारे… जैसे कॉलम अपनी कलम के माध्यम से परोसा, जिसे पाठकों ने हाथोहाथ लिया। हां गड़बड़ हो जाती तो पाठकों का फोन घनघनानते लगता है। इससे आपको मालूम पड़ता है कि आपका पाठक आपके अखबार के प्रति कितना गंभीर है। यही आपको अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह भी बनाता है। होड़-जोड़ की इस प्रतिस्पर्धा में कब अग्निबाण के 49 साल पूरे हो गए, ये पता ही नहीं चला। अग्निबाण तो आज भी अपने पाठकों का प्रिय है और आगे भी रहेगा, इसमें कोई शक नहीं है।
-संजीव मालवीय
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