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राम आएंगे तो हम माल खाएंगे… उनकी झोपड़ी के भाग तब खुल जाएंगे…

July 08, 2026

आस्था का सौदा…विश्वास की नीलामी…डर का व्यापार…भगवान के नाम पर डराओ…मंदिर के नाम पर उगाओ…कथा को व्यापार बनाओ… दु:खी, दर्दी, गरीब और बेबस लोगों को जुटाओ…उनको वोट बैंक बनाओ और सत्ता में घुस जाओ…भगवान राम को हिंदुओं का ठप्पा बना दिया…दिल ही नहीं, दिमाग पर लगा दिया… करोड़ों शिलाएं अयोध्या पहुंच गर्इं… फिर भी पैसों की कमी पड़ गई तो चंदे का धंधा शुरू किया गया… मंदिर बनाने में अरबों का खजाना लगा दिया…फिर भी पैसा इतना था कि खर्च ही नहीं हो रहा था, इसलिए केवल प्राण प्रतिष्ठा में ही 113 करोड़ खर्च कर डाले…यह और बात है कि इस प्राण-प्रतिष्ठा में केवल गिनती के लोगों को बुलाया… उस बुलावे में भी भक्त नहीं सारे के सारे सशक्त लोग थे… कोई मंडलेश्वर था तो कोई महामंडलेश्वर…कोई अंबानी था तो कोई अडानी…कोई अरबपति था तो कोई खरबपति…कोई मंत्री था तो कोई मुख्यमंत्री…जिनको बुलाया, उन्हें भी कतार में लगाया…लेकिन पब्लिसिटी पर 22 करोड़ खर्च कर डाले…फिर भी दान की खान खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी तो अक्षत पूजन कार्यक्रम रखा और उसमें 31 करोड़ खर्च किए…अब जब पैसा ढुलता नजर आएगा तो लूटने वालों की कतार लाजमी है…अब ऐसे में कोई चंदा चुराए…गिनती करते उड़ा ले जाए…जेब में फंसाए या मोजे में छुपाए तो गलती उसकी थोड़ी ही है… ईमानदार तो वही रहता है, जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिलता है… और मिले तो भी न करे तो मूर्ख कहलाता है…इसीलिए डकैतों की जमात में चोरों का हक तो बनता ही है…फर्क केवल इतना कि ऊपर वाले खर्च के नाम पर खा रहे थे तो नीचे वाले चिंदी चोरों की तरह चंदा चुरा रहे थे…अब चोरों की चिंदी तो पकड़ ली, लेकिन डकैतों के डाके कैसे पकड़ोगे…कसूर उनका नहीं इस देश के लोगों का है…घर में फाके करेंगे, लेकिन भगवान के नाम पर भंडार भर देंगे…किसी भूखे को रोटी नहीं खिलाएंगे, लेकिन चढ़ावे में लाखों चढ़ाएंगे…किसी बीमार का इलाज नहीं कराएंगे, लेकिन खुद आस्था के बीमार बनकर दौलत लुटाएंगे…इस दौलत में भी दाग रहता है…इन बड़े मंदिरों में चोरी का भी चढ़ावा चढ़ता है… बुरे कर्म करने वाला जब भगवान से डरता है तो घूस में दान देकर खुद को भयमुक्त कर लेता है…तभी तो सरकारी नौकरी करने वाले देश के पूर्व केंद्रीय गृह सचिव एस. लक्ष्मीनारायण ने सोने की परत चढ़ी 5 करोड़ की रामचरित मानस मंदिर में चढ़ा दी…लेने वालों ने भी आने दो, आने दो कहकर माथे से लगा ली…अपने पूरे जीवन की नौकरी में जितना वेतन नहीं लिया होगा उससे ज्यादा कीमत का चढ़ावा चढ़ाकर वो भक्ति दिखा रहे हैं और कोई यह जानने की जहमत नहीं उठा रहा है कि इतनी कीमती सौगात के पैसे कहां से लाया…जब इतना चढ़ाया तो घर में कितना छुपाया… लेने वाला भी चोर और देने वाला भी चोर, फिर भी देश के सिरमौर…जो अपनी मेहनत की कमाई दान में चढ़ाते हैं, अपने दान का मोल लगा नहीं पाते हैं…आस्था का मतलब समझ नहीं पाते हैं…दान या तो मंदिर के रखरखाव-भर का होना चाहिए और ज्यादा हो जाए तो गरीबों के भोजन और पशुओं के चारे के लिए रहना चाहिए…इससे भी ज्यादा हो तो मानवसेवा में लगना चाहिए…लेकिन देश के मंदिरों में सरकार के खजाने से ज्यादा पैसा और सोना दबा पड़ा है…देश तो आज भी सोने की चिडिय़ा है, लेकिन वह चिडिय़ा मंदिरों में कैद है… और हमारे मंदिर तो मठाधीशों… सत्तानशीनों… चोरों और डकैतों की कैद में है…


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