
जबलपुर। संस्कारधानी में बेटियों की सुरक्षा को लेकर सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में शहर और जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों से 275 लड़कियों के लापता होने के मामले दर्ज हुए। इनमें से पुलिस ने 215 युवतियों और किशोरियों को सकुशल बरामद कर लिया है, लेकिन 60 बेटियां अब भी लापता हैं। उनकी तलाश के लिए पुलिस की टीमें, साइबर सेल और स्थानीय मुखबिर लगातार सक्रिय हैं।
डिजिटल फ्रेंडशिप बन रही सबसे बड़ा खतरा
पुलिस जांच और गुमशुदगी के मामलों के विश्लेषण में यह बात बार-बार सामने आई है कि अधिकांश मामलों में सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरा है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अनजान लोगों से हुई दोस्ती कई किशोरियों को घर छोडऩे तक ले जा रही है।पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों में पहले ऑनलाइन बातचीत होती है, फिर विश्वास कायम किया जाता है और उसके बाद बेहतर जीवन, प्रेम या शादी के सपने दिखाकर किशोरियों को घर छोडऩे के लिए प्रेरित किया जाता है। बरामदगी के बाद हुई पूछताछ में ऐसी परिस्थितियां कई मामलों में सामने आई हैं।
अभिभावकों के लिए चेतावनी
पुलिस ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर संवेदनशील निगरानी रखें। केवल मोबाइल देने से जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। बच्चों से नियमित संवाद, उनके मित्रों की जानकारी, सोशल मीडिया उपयोग की समझ और भावनात्मक सहयोग ऐसी घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
जनवरी से जून 2026
रक्षक नहीं, कई मामलों में परिचित ही निकले आरोपी
जांच एजेंसियों के सामने आया एक और चिंताजनक पहलू यह है कि सभी मामलों में कोई अज्ञात व्यक्ति शामिल नहीं होता। कई प्रकरणों में आरोपी परिवार, मोहल्ले या परिचितों के दायरे से जुड़े लोग ही पाए गए। भरोसे का फायदा उठाकर किशोरियों को बहलाने-फुसलाने और अपने साथ ले जाने के मामले भी सामने आए हैं। यही कारण है कि पुलिस अब केवल तकनीकी जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि परिचितों और सोशल नेटवर्क की भी गहन पड़ताल कर रही है।
छोटी-सी नाराजगी, बड़ा फैसला
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था में भावनात्मक अस्थिरता पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही है। पढ़ाई का दबाव, मोबाइल की लत, पारिवारिक विवाद, माता-पिता की डांट या भविष्य को लेकर तनाव जैसे कारण कई बच्चों को आवेश में गलत निर्णय लेने की ओर धकेल रहे हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, यही मानसिक स्थिति ऑनलाइन ठगों और अपराधियों के लिए अवसर बन जाती है। वे भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाकर किशोरियों को अपने प्रभाव में ले लेते हैं।
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