
जिस पहली ट्रेन ने मालवा के विकास की राह खोली उसकी वर्षगांठ भी भूल गया रेलवे, 3 अगस्त 1876 को इंदौर पहुंची थी पहली मालगाड़ी
इंदौर, विकाससिंह राठौर।
इंदौर (Indore) के रेल इतिहास (Railway History) का कल 3 अगस्त 2026 को स्वर्णिम दिन (Golden Days) था। अब से ठीक 150 वर्ष पहले 3 अगस्त 1876 को इंदौर में पहली रेल पहुंची थी। यह मालगाड़ी (Goods train) थी, जो रेल लाइन के लिए गिट्टी लेकर आई थी। इसी के साथ होलकर राज्य में रेलवे युग का सूत्रपात हुआ और अगले वर्ष 1877 में नियमित यात्री रेल सेवा शुरू हो गई। इस ऐतिहासिक घटना ने न केवल इंदौर, बल्कि पूरे मालवा के व्यापार, उद्योग और आवागमन की दिशा बदल दी। विडंबना यह है कि रेलवे के 150 वर्ष पूरे होने जैसे गौरवशाली अवसर पर न रेलवे प्रशासन ने कोई आयोजन किया, न जनप्रतिनिधियों, रेलवे सलाहकार समिति या किसी सामाजिक संगठन ने इस ऐतिहासिक विरासत को याद करने की पहल की।
रेलवे विशेषज्ञ नागेश नामजोशी ने बताया कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंदौर मध्य भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन चुका था। उस समय मुंबई बंदरगाह और देश के अन्य हिस्सों तक माल पहुंचाने में कई दिन लगते थे। इसे देखते हुए तत्कालीन होलकर महाराजा तुकोजीराव द्वितीय ने इंदौर को रेल नेटवर्क से जोड़ने का निर्णय लिया। इसके लिए होलकर राज्य और तत्कालीन ब्रिटिश शासन के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ। इस समझौते के तहत होलकर राज्य ने रेलवे निर्माण के लिए करीब एक करोड़ रुपए की राशि साढ़े चार प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर 100 वर्षों के लिए उपलब्ध कराई। उस दौर में यह राशि बेहद बड़ी थी। इसी आर्थिक सहयोग के बाद इंदौर तक रेल लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ और मालवा में रेलवे का सपना साकार होने लगा।
150 साल पूरे… लेकिन कहीं कोई याद नहीं
आज रेलवे अमृत भारत स्टेशन योजना, नई ट्रेनों और आधुनिक सुविधाओं की बात कर रहा है, लेकिन जिस ऐतिहासिक विरासत ने इंदौर को रेलवे से जोड़ा, उसी के 150 वर्ष पूरे होने पर शहर में कोई कार्यक्रम नहीं हुआ। न स्टेशन पर कोई प्रदर्शनी लगी, न स्मृति समारोह आयोजित हुआ और न ही रेलवे के इस गौरवशाली इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोई पहल दिखाई दी। इतिहासकारों का मानना है कि ऐसे अवसर केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि शहर की पहचान और विरासत को संजोने का माध्यम भी होते हैं। इंदौर की रेलवे यात्रा केवल एक रेल लाइन की कहानी नहीं, बल्कि मालवा के आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक विकास की कहानी भी है।
खंडवा से इंदौर तक बिछी रेल लाइन
रेल मार्ग को तत्कालीन ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे की खंडवा लाइन से जोड़ने का निर्णय लिया गया। पहाड़ों, घाटों और नर्मदा क्षेत्र जैसे कठिन भूभाग में पुलों और कटिंग के साथ रेल लाइन बिछाई गई। यह उस समय की सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिनी जाती थी। निर्माण कार्य के दौरान 3 अगस्त 1876 को रेल लाइन निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री लेकर पहली मालगाड़ी खंडवा से महू होते हुए इंदौर पहुंची। यहां से यह फतेहाबाद होकर उज्जैन गई। यही दिन इंदौर में रेलवे के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद शेष कार्य पूरा हुआ और 1877 में इंदौर से नियमित यात्री रेल सेवा प्रारंभ कर दी गई।
रेल सुविधाओं के लिए वर्षों तक करना पड़ा संघर्ष, आज भी जारी
रेलवे आने के बाद भी इंदौर को सुविधाएं आसानी से नहीं मिलीं। नई ट्रेनों, लंबी दूरी की सेवाओं, आरक्षण कार्यालय, प्लेटफॉर्म विस्तार और अन्य सुविधाओं के लिए शहर को वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। इंदौर को प्रत्येक नई रेल सुविधा के लिए जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को लगातार प्रयास करने पड़े। रेल सुविधा के लिए शहर का यह संघर्ष आज भी जारी है।
100 साल पूरे होने पर मनाया गया था जश्न
नामजोशी के अनुसार जब 1976 में रेलवे के 100 वर्ष पूरे हुए थे, तब दिनकर सोमण के साथ मिलकर एक छोटा समारोह आयोजित किया गया था। उस अवसर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने एक स्मृति कार्ड कैलेंडर भी प्रकाशित किया था। उस समय अश्विनी कुमार मंडल अधीक्षक थे।
150 साल की रेल यात्रा
– 25 मई 1870 को शिमला में होलकर राज्य और ब्रिटिश शासन के बीच रेलवे निर्माण का समझौता हुआ।
– महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय भारत के पहले राजा थे, जिन्होंने रेल सेवा के लिए अंग्रेजों को कर्ज दिया।
– 4.5त्न प्रतिवर्ष की दर से 100 वर्षों के लिए यह कर्ज दिया गया।
– 3 अगस्त 1876: निर्माण सामग्री लेकर पहली मालगाड़ी इंदौर पहुंची।
– यह ट्रेन खंडवा से महू होते हुए इंदौर आई और इंदौर से फतेहाबाद होते हुए उज्जैन पहुंची।
– 1877 में इंदौर से नियमित यात्री रेल सेवा शुरू हुई।
– 1881-82 : होलकर स्टेट रेलवे का विस्तार और अन्य रेल लाइनों से जुड़ाव।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved