
जबलपुर। उच्च न्यायालय में बहुचर्चित 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों की सुनवाई अब पूरी हो चुकी है। अदालत की डिवीजन बेंच ने लगातार 15 दिनों तक चली लंबी और विस्तृत बहस के बाद इस महत्वपूर्ण मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। इस फैसले पर पूरे प्रदेश के युवाओं और अभ्यर्थियों की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि इसका सीधा प्रभाव आगामी भर्तियों और प्रवेश परीक्षाओं पर पडऩे वाला है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के समक्ष इस मामले की अंतिम सुनवाई बुधवार को संपन्न हुई। सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग के अधिवक्ताओं की ओर से जोरदार तर्क पेश करते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी मामले में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि देश या किसी भी राज्य में आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके विपरीत ओबीसी वर्ग की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने दलील दी कि मध्य प्रदेश में ओबीसी वर्ग की कुल आबादी 51 प्रतिशत से भी अधिक है। इसलिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की तरह ही अन्य पिछड़ा वर्ग को भी उनकी कुल जनसंख्या के अनुपात में ही आरक्षण का पूरा लाभ मिलना चाहिए। दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा अपने-अपने पक्ष में विभिन्न कानूनी दस्तावेज, आंकड़े और पूर्व फैसलों के हवाले दिए गए।
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