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छात्र प्रदर्शन और बहुमत के बावजूद सरकार को नहीं मिली राहत, NEET विवाद से लेकर विधेयकों तक विपक्ष ने संसद में बनाए रखी चुनौती

August 14, 2026

नई दिल्ली । संसद (Parliament) का मानसून सत्र (Monsoon Session) इस बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव का गवाह बना। सत्र की शुरुआत से पहले राजनीतिक परिस्थितियां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (National Democratic Alliance) के पक्ष में दिखाई दे रही थीं, लेकिन छात्र प्रदर्शन (Student Protests), पुलिस कार्रवाई और कुछ उपचुनावों के परिणामों ने राजनीतिक माहौल बदल दिया। विपक्ष ने इन मुद्दों को संसद के भीतर और बाहर जोरदार तरीके से उठाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता और कुछ विपक्षी सांसदों के पाला बदलने के बाद एनडीए का मनोबल मजबूत माना जा रहा था। ऐसी स्थिति में सरकार से संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलने और महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की उम्मीद थी। हालांकि, छात्रों से जुड़े विवाद ने विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा दे दिया, जिस पर उसने व्यापक राजनीतिक एकजुटता कायम करने का प्रयास किया।

नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और छात्रों के प्रदर्शन पर हुई कार्रवाई को विपक्ष ने प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया। विपक्षी दलों ने इस विषय पर विस्तृत चर्चा और सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब की मांग की। लगातार विरोध और हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई और निर्धारित कामकाज प्रभावित हुआ।

कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई। बांकीपुर और दतिया उपचुनावों में भाजपा की हार ने भी विपक्षी दलों के भीतर आत्मविश्वास बढ़ाया। इन परिणामों को विपक्ष ने सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनने के संकेत के तौर पर पेश किया।

मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज रही। हालांकि, सरकार ने इन विषयों पर आगे बढ़ने के बजाय कुछ महत्वपूर्ण मामलों को समितियों के पास भेजने का रास्ता अपनाया। विदेशी अंशदान विनियमन से जुड़े संशोधन विधेयक को भी आगे की समीक्षा के लिए संसदीय प्रक्रिया के तहत भेजा गया।

विपक्षी एकता की एक महत्वपूर्ण तस्वीर तमिलनाडु के मुद्दों पर भी दिखाई दी। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और कांग्रेस के बीच कुछ राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संसद में कई मुद्दों पर दोनों दल सरकार के खिलाफ एक साथ नजर आए। नीट और कावेरी जल समझौते जैसे विषयों पर डीएमके ने अपना विरोध जारी रखा।

वंदे मातरम् से जुड़े विधायी प्रस्ताव पर भी डीएमके ने तीखी आपत्ति जताई। विपक्षी दलों ने इसे अलग-अलग राजनीतिक नजरिए से उठाया, लेकिन सरकार के खिलाफ साझा विरोध कई मौकों पर दिखाई दिया। छात्रों पर कार्रवाई और अन्य विवादित मुद्दों को लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कई दलों ने समन्वय बनाए रखा।

संसद की कार्यवाही बाधित होने का असर जनहित से जुड़े मुद्दों पर भी पड़ा। लगातार स्थगन के कारण सांसद अपने क्षेत्रों से जुड़े कई विषयों को अपेक्षित तरीके से सदन में नहीं उठा सके। उच्च शिक्षा से जुड़े प्रस्ताव पर भी विस्तृत चर्चा पूरी नहीं हो सकी और मामला आगे की संसदीय प्रक्रिया में चला गया।

अब विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन मुद्दों को संसद के बाहर भी राजनीतिक रूप से प्रभावी बनाए रखने की है। छात्र आंदोलन से जुड़े विषय को कांग्रेस देशभर में उठाने की तैयारी में है, जबकि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस अपने स्तर पर अन्य मुद्दों को आगे ले जाने की कोशिश कर सकती हैं।


  • संसद के कामकाज पर होने वाले खर्च का मुद्दा भी इस दौरान चर्चा में रहा। उपलब्ध संसदीय अनुमान के अनुसार सदन की कार्यवाही पर प्रति मिनट लाखों रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में लगातार व्यवधान से न केवल विधायी काम प्रभावित होता है, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर भी सवाल उठते हैं। यही वजह है कि मानसून सत्र ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सामने संसद चलाने तथा राजनीतिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने की चुनौती को फिर सामने ला दिया है।

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