
जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस केंद्रीय जेल में चार कैदी ऐसे हैं, जो अदालत से मिली मूल सजा पूरी करने के बाद भी जेल से बाहर नहीं आ सके हैं। वजह है—अदालत द्वारा लगाया गया जुर्माना जमा नहीं कर पाना। आर्थिक तंगी के कारण इन कैदियों के लिए जुर्माने की रकम जुटाना मुश्किल साबित हो रहा है और नतीजतन उन्हें अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ रहा है। इनमें एक कैदी ऐसा भी है, जिसने 10 साल से अधिक की सजा पूरी कर ली, लेकिन जुर्माना नहीं भर पाने के कारण उसकी रिहाई अटक गई है। जेल रिकॉर्ड के अनुसार, इन चार कैदियों में एक नक्सल मामले से संबंधित है, जबकि तीन कैदी एनडीपीएस एक्ट के तहत सजा काट रहे हैं।
कानूनी प्रावधानों के तहत अदालत द्वारा निर्धारित जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में दोषी को आदेश में निर्धारित अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है। यही प्रावधान इन कैदियों की रिहाई में बाधा बना हुआ है। मूल सजा पूरी होने के बावजूद जुर्माने की राशि जमा नहीं होने से अतिरिक्त सजा पूरी होने तक उन्हें जेल में रहना पड़ रहा है। जेल में बंद संजय पिता रामटहल को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। उसकी मूल सजा पूरी हो चुकी है, लेकिन उस पर लगाया गया 26 हजार रुपए का जुर्माना जमा नहीं हो सका। जुर्माना नहीं भरने के कारण उसे आदेशानुसार 34 माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी पड़ रही है। गोलू इंद्रकुमार, निवासी गढ़ा शास्त्री नगर, को भी 10 वर्ष की सजा हो चुकी है। उसने अपनी मूल सजा पूरी कर ली, लेकिन अदालत द्वारा लगाया गया एक लाख रुपए का जुर्माना जमा नहीं कर पाया। इसके चलते उसे चार माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी पड़ रही है। एनडीपीएस एक्ट के मामले में सजा काट रहे महबूब ने भी 10 वर्ष की मूल सजा पूरी कर ली है। उसके ऊपर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था, जिसे वह जमा नहीं कर पाया। इसके चलते उसे पांच माह की अतिरिक्त सजा काटनी पड़ रही है।
पांच साल पूरे, फिर भी एक साल और जेल
सम्भर लाला, निवासी डिंडौरी, को पांच वर्ष की सजा हुई थी। उसकी मूल सजा पूरी हो चुकी है, लेकिन 50 हजार रुपए का जुर्माना जमा नहीं होने के कारण उसे एक वर्ष की अतिरिक्त सजा भुगतनी पड़ रही है।
गरीब कैदियों के लिए जुर्माना बना दूसरी सजा
इन मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कैदी अपनी मूल सजा पूरी कर चुके हैं, तब केवल जुर्माने की रकम का इंतजाम नहीं हो पाने के कारण उन्हें अतिरिक्त समय जेल में बिताना पड़ रहा है। जिन कैदियों के परिवार आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, उनके लिए हजारों या लाखों रुपए की जुर्माना राशि जुटाना बेहद मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं ऐसे जरूरतमंद कैदियों की जुर्माना राशि जमा कर उनकी रिहाई में मदद करती हैं। ऐसे में इन चार कैदियों के मामले में भी यदि कोई संस्था या सक्षम व्यक्ति कानूनी प्रक्रिया के तहत जुर्माना जमा करता है, तो उनकी रिहाई की राह आसान हो सकती है।
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