
पाटन। गांव की शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव की शासकीय भूमि पर 13 लोगों के कब्जे की शिकायत की गई थी, लेकिन कार्रवाई के दौरान 7 लोगों के नाम हटा दिए गए और केवल 6 लोगों के कब्जे हटाने के आदेश दिए गए। ग्रामीणों का सवाल है कि जब शिकायत शासकीय भूमि पर कब्जे की थी तो सभी कब्जों की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? सबसे गंभीर मामला गांव की श्मशान भूमि का बताया जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार श्मशान के लिए दर्ज भूमि 3 एकड़ से अधिक है, लेकिन वर्तमान में मौके पर आधा एकड़ भूमि भी शेष नहीं बची है। ग्रामीणों का आरोप है कि श्मशान की जमीन पर लंबे समय से कब्जे होते रहे, लेकिन संबंधित अतिक्रमणों को हटाने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।
गरीबों पर कार्रवाई, दबंगों पर क्यों नहीं?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गांव में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कथित रूप से अनैतिक गतिविधियां करते हैं अथवा गांव के दबंग लोगों के माध्यम से ऐसे काम करवाते हैं, लेकिन उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन अतिक्रमण हटाने को लेकर गंभीर है तो श्मशान भूमि सहित अन्य शासकीय जमीनों पर काबिज सभी लोगों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
29 सितंबर को एसडीएम को दिया आवेदन
कब्जा हटाने की कार्रवाई से प्रभावित छह लोगों ने 29 सितंबर को एसडीएम मानवेन्द्र सिंह के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। एसडीएम द्वारा मामले की जांच के लिए नायब तहसीलदार रश्मि चौधरी को निर्देशित किया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि जांच के दौरान न तो गांव के लोगों से पर्याप्त जानकारी ली गई और न ही मौके पर जाकर पूरी स्थिति का परीक्षण किया गया। ग्रामीणों के अनुसार मौके पर मौजूद हल्का पटवारी नितिन दुबे एवं ग्राम सचिव सुमित दाहिया के समक्ष भी यह बताया गया था कि संबंधित क्षेत्र में अन्य कई लोग काबिज हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह जानकारी जांच प्रतिवेदन में भी लिखित रूप से दी गई है। अब ग्रामीणों ने मांग की है कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड, वर्तमान रिकॉर्ड, खसरा-नक्शा एवं मौके की स्थिति का मिलान कराकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
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