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कोरोना काल में बेरोजगारी का रोना रोने वालों को सबक दे रहा है मेरठ का ये गांव, जानें- क्या है खास

मेरठ: कोरोना काल के मुश्किल दौर में जहां लोग बेरोजगारी का रोना रो रहे हैं तो वहीं, मेरठ के एक गांव का हर घर आत्मनिर्भर है. सैकड़ों की आबादी वाले इस गांव ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है. यहां हर घर में फुटबॉल बनाई जाती है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस गांव में तकरीबन 3800 घर हैं और हर घर फुटबॉल बनाने के काम में जुटा हुआ है. किसी घर में फुटबॉल बनाने के लिए कटाई होती है तो कहीं सिलाई और फ्यूजिंग. ये गांव फुटबॉल वाले गांव के नाम से विख्यात हो गया है.

गांव ने खुद को आत्मनिर्भर बनाया
कोरोना काल में जहां एक तरफ लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है तो वहीं मुसीबत के इस दौर में मेरठ के इस गांव ने खुद को आत्मनिर्भर बना लिया है. मेरठ से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर सिसौला कला गांव में कोई युवा बेरोजगार नहीं है. यहां हर हाथ को काम है.

फुटबॉल वाले गांव के नाम से फेमस
मेरठ के इस गांव को फुटबॉल वाले गांव के नाम से जाना जाता है क्योंकि यहां हर घर में फुटबॉल बनाने का कार्य होता है. कहीं फुटबॉल के लिए आए कच्चे मटेरियल की कटाई की जाती है तो कहीं सिलाई और फ्यूजिंग. खासतौर से युवा यहां अपनी फुटबॉल से बेरोजगारी को किक मारते हुए नजर आ रहे हैं.

चमड़ा उद्योग चमक रहा है
मेरठ के जानी इलाके में इस गांव के अलावा कई ऐसे गांव हैं जहां चमड़ा उद्योग चमक रहा है. कहीं जूते बनाए जा रहे हैं तो कहीं पर्स, बैग बेल्ट, ग्लब्स, जैकेट जैसे सामान बनाए जा रहा हैं. ग्रामीणों के इसी जुनून को देखते हुए अब उद्योग विभाग भी लैदर क्लस्टर को लेकर कवायद कर रहा है.

जॉब सेंटर बन जाएगा पूरा क्षेत्र
यहां सभी संसाधन और सुविधाएं मिलें इसके लिए विभाग युद्ध स्तर पर जुट गया है. जिला उद्योग केन्द्र के उपायुक्त का कहना है कि योजना तैयार है, बस इंतजार है तो केंद्र सरकार की स्टेयरिंग कमेटी की हरी झंडी का. अगर ऐसा हो गया तो मेरठ का चमड़ा उद्योग वैश्विक ख्याति प्राप्त करेगा और ये क्षेत्र जॉब सेंटर बन जाएगा.

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