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भारत के परमाणु भंडार में बढ़ोतरी का अनुमान, FAS ने 190 परमाणु हथियार होने का किया दावा

September 11, 2026

वाशिंगटन। भारत की परमाणु क्षमता (India’s nuclear capability) को लेकर अमेरिका के फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) ने ताजा अनुमान जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास करीब 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार (Nuclear weapons) हो सकते हैं। इनमें 160 से अधिक ऐसे हथियार बताए गए हैं जो मौजूदा समय में सक्रिय डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हैं। हालांकि, भारत सरकार अपने परमाणु हथियारों के भंडार की आधिकारिक संख्या सार्वजनिक नहीं करती है।

FAS सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ऐसे अनुमान इसलिए चर्चा में रहते हैं क्योंकि परमाणु शक्ति संपन्न अधिकांश देश अपने परमाणु हथियारों की वास्तविक संख्या सार्वजनिक नहीं करते। भारत भी आधिकारिक तौर पर अपने परमाणु भंडार का आंकड़ा जारी नहीं करता। इसलिए FAS का आकलन अनुमान पर आधारित है और वास्तविक संख्या इससे कम या अधिक हो सकती है।


  • लॉन्चरों से अधिक हथियार तैयार होने का दावा

    FAS के मुताबिक भारत ने वर्तमान में तैयार डिलीवरी सिस्टम से जुड़े हथियारों की तुलना में अधिक परमाणु हथियार तैयार कर रखे हैं। अनुमानित 190 हथियारों में से करीब 160 हथियार मौजूदा लॉन्चरों से जुड़े हैं, जबकि बाकी हथियार भविष्य में इस्तेमाल होने वाले डिलीवरी सिस्टम के लिए रखे गए हैं।

    रिपोर्ट में अग्नि-प्राइम और लंबी दूरी की समुद्र आधारित के-4 जैसी मिसाइलों का उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक डिलीवरी सिस्टम के पूरी तरह सेवा में आने से पहले ही उसके लिए हथियारों का उत्पादन शुरू कर देना परमाणु शक्तियों में असामान्य नहीं है। इसका उद्देश्य नए सिस्टम के तैयार होते ही उनके लिए हथियार उपलब्ध रखना होता है।

    अतिरिक्त हथियारों से बढ़ेगी प्रतिरोधक क्षमता

    FAS के अनुमान में बताए गए अतिरिक्त हथियारों को भारत की भविष्य की परमाणु क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है। नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आने पर उनके लिए पहले से हथियार उपलब्ध होने से भारत की प्रतिरोधक क्षमता को तेजी से मजबूत किया जा सकता है।

    तनाव या युद्ध जैसी स्थिति में लॉन्चर और हथियारों को एकीकृत करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। भारत अपनी परमाणु नीति में विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता पर जोर देता रहा है। ऐसे में अतिरिक्त हथियारों को मौजूदा क्षमता को बनाए रखने और भविष्य की जरूरतों के लिए तैयारी के रूप में देखा जा सकता है।

    FAS का अनुमान, आधिकारिक आंकड़ा नहीं

    FAS का यह आंकड़ा भारत सरकार की ओर से जारी आधिकारिक संख्या नहीं है। ऐसे अनुमान खुले स्रोतों, उपग्रह तस्वीरों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अन्य सूचनाओं के विश्लेषण पर आधारित होते हैं। इसलिए भारत के वास्तविक परमाणु भंडार की संख्या अलग हो सकती है।

    इसके बावजूद FAS जैसी संस्थाओं के आकलन का अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं में महत्व रहता है। इनसे विभिन्न देशों की परमाणु क्षमता और उसके संभावित विकास की दिशा का अनुमान लगाने में मदद मिलती है।

    नो-फर्स्ट-यूज नीति का उल्लेख

    रिपोर्ट में भारत की परमाणु नीति के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू का भी उल्लेख किया गया है। भारत ने लंबे समय से नो-फर्स्ट-यूज यानी पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल न करने की नीति घोषित कर रखी है। भारत की घोषित नीति के अनुसार परमाणु हथियारों का इस्तेमाल परमाणु हमले की स्थिति में किया जाएगा।

    भारत ने 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद से स्वयं घोषित परीक्षण रोक भी जारी रखी है। इसके बाद भारत ने कोई नया परमाणु परीक्षण नहीं किया है। परमाणु भंडार में अनुमानित बढ़ोतरी के बावजूद इन घोषित नीतियों में बदलाव नहीं हुआ है।

    तीनों मोर्चों पर परमाणु क्षमता मजबूत करने की कोशिश

    भारत पिछले कई दशकों से अपनी परमाणु क्षमता के लिए जमीन, समुद्र और हवा आधारित डिलीवरी सिस्टम विकसित कर रहा है। लैंड बेस्ड मिसाइलों के साथ समुद्र आधारित परमाणु क्षमता और हवाई प्लेटफॉर्म पर भी काम जारी रहा है।

    अग्नि-प्राइम जैसी आधुनिक मिसाइलें और के-4 जैसी समुद्र आधारित मिसाइलें भारत की डिलीवरी क्षमता के विस्तार से जुड़ी हैं। नए सिस्टम के साथ अतिरिक्त परमाणु हथियारों की उपलब्धता को इसी व्यापक रणनीतिक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।

    दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरण पर असर

    भारत की परमाणु क्षमता का विस्तार दक्षिण एशिया के रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। भारत आधिकारिक तौर पर अपनी नीति को न्यूनतम लेकिन विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के सिद्धांत से जोड़ता रहा है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नए डिलीवरी सिस्टम के साथ हथियारों का उत्पादन पहले से करना भविष्य की तैयारियों का हिस्सा हो सकता है। डिलीवरी सिस्टम तैयार होने में लंबा समय लग सकता है, जबकि हथियारों का उत्पादन अलग गति से आगे बढ़ सकता है। इसलिए दोनों के बीच संख्या का अंतर अपने आप में किसी अव्यवस्थित विस्तार का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    आने वाले वर्षों में अग्नि-प्राइम और समुद्र आधारित के-4 जैसे सिस्टम के अधिक व्यापक रूप से सेवा में आने के साथ भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का स्वरूप और स्पष्ट हो सकता है। FAS का ताजा अनुमान इसी दीर्घकालिक विकास की दिशा में भारत की क्षमता में धीरे-धीरे हो रही बढ़ोतरी की ओर संकेत करता है।

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