
नई दिल्ली । महाराष्ट्र में महिला डॉक्टर के साथ मारपीट के मामले ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने शिवसेना (Shiv Sena) नेता और एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के समर्थक रमेश म्हात्रे (Ramesh Mhatre) को दी गई जमानत रद्द करते हुए उन्हें निर्धारित समय के भीतर अदालत के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा कर्मियों पर हमला केवल एक व्यक्ति के खिलाफ अपराध नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था (Healthcare System) और कानून के प्रति असम्मान का गंभीर मामला है। इस फैसले के बाद राज्य में डॉक्टरों की सुरक्षा और अस्पतालों में कानून-व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड का विस्तृत विवरण रखा गया। न्यायालय ने कहा कि रमेश म्हात्रे के खिलाफ पहले से 18 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं और इस तथ्य को जमानत देते समय पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। अदालत ने माना कि किसी आरोपी के पुराने मामलों और उसके आचरण का मूल्यांकन जमानत पर निर्णय लेते समय आवश्यक होता है, विशेष रूप से तब जब आरोप गंभीर प्रकृति के हों। न्यायालय ने इस आधार पर निचली अदालत के आदेश को उचित नहीं माना और उसे निरस्त कर दिया।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि भले ही आरोपी कुछ मामलों में बरी हो चुका हो, लेकिन उसके खिलाफ दर्ज गंभीर मामलों की अनदेखी नहीं की जा सकती। न्यायालय के अनुसार, हत्या जैसे गंभीर आरोपों सहित कई मामलों का रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि आरोपी की पृष्ठभूमि पर विचार किया जाना आवश्यक था। ऐसे में जमानत का आदेश न्यायिक विवेक के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
यह मामला उस समय सामने आया था जब मुंबई के डोंबिवली स्थित एक सरकारी अस्पताल में एक मरीज के लिए तत्काल बेड उपलब्ध कराने को लेकर विवाद हुआ। आरोप है कि बेड उपलब्ध न होने की जानकारी मिलने पर रमेश म्हात्रे ने अस्पताल में मौजूद महिला डॉक्टर के साथ अभद्र व्यवहार किया, गाली-गलौज की और थप्पड़ मार दिया। घटना के बाद अस्पताल परिसर में तनाव का माहौल बन गया और चिकित्सकों ने इस घटना को चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा पर गंभीर हमला बताया।
महिला डॉक्टर की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया था, लेकिन बाद में निचली अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। इस फैसले के बाद राज्यभर के डॉक्टरों और मेडिकल संगठनों में नाराजगी बढ़ गई। कई संगठनों ने चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग करते हुए सामूहिक विरोध और हड़ताल की घोषणा की थी। उनका कहना था कि अस्पतालों में लगातार बढ़ रही हिंसक घटनाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत रद्द करने के साथ ही डॉक्टरों से भी अपनी प्रस्तावित हड़ताल पर पुनर्विचार करने की अपील की। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से कानून अपना काम कर रहा है और दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। इस फैसले को चिकित्सा समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है कि अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में न्यायालय किसी भी प्रकार की लापरवाही को स्वीकार नहीं करेगा।
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