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धर्म नहीं, बच्चे का हित सर्वोपरि: मद्रास हाई कोर्ट ने गोदनामा विवाद में हिंदू दंपत्ति के पक्ष में दिया फैसला

May 01, 2026

नई दिल्ली। तमिलनाडु (Tamil Nadu) से सामने आए एक संवेदनशील गोदनामा विवाद (Controversy in certification) में मद्रास हाई कोर्ट (Madras High Court) ने अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि बच्चे के हित से बढ़कर कुछ नहीं है। अदालत ने अलग-अलग धर्म के बावजूद एक हिंदू दंपत्ति को मुस्लिम बच्ची का कानूनी अभिभावक मानने की अनुमति दे दी।

क्या था मामला?
दरअसल, एक हिंदू दंपत्ति ने अपने पड़ोस में रहने वाली एक मुस्लिम महिला की नवजात बच्ची को गोद लिया था। महिला आर्थिक तंगी से जूझ रही थी और पहले से ही बच्चों की जिम्मेदारी संभाल रही थी। ऐसे में उसने अपनी तीसरी बेटी को स्वेच्छा से इस दंपत्ति को सौंप दिया। दंपत्ति 2012 से संतान के लिए प्रयास कर रहा था, लेकिन सफल नहीं हो पाया था।


  • फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी याचिका
    जब दंपत्ति ने गोदनामा को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख किया, तो वहां उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि वे बच्ची के लिए “अजनबी” हैं। इसके बाद दंपत्ति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।

    हाई कोर्ट ने क्या कहा?
    मामले की सुनवाई करते हुए अदालत की पीठ ने पहले बच्ची की जैविक मां और परिवार को बुलाकर स्थिति स्पष्ट की। मां ने कोर्ट में माना कि उसने अपनी इच्छा से बच्ची को दंपत्ति को सौंपा है और वही लोग शुरुआत से उसकी देखभाल कर रहे हैं। बच्ची भी उसी दंपत्ति को अपने माता-पिता के रूप में पहचानती है।

    अदालत ने कहा कि:

    • बच्ची का पालन-पोषण सही तरीके से हो रहा है
    • जैविक मां को कोई आपत्ति नहीं है
    • बच्ची का भावनात्मक जुड़ाव दंपत्ति के साथ है

    इन सभी तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने गोदनामा स्वीकार कर लिया।

    कानून क्या कहता है?
    अदालत ने गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी नाबालिग के अभिभावक तय करते समय सबसे महत्वपूर्ण उसकी भलाई होती है। धर्म इस प्रक्रिया में बाधा नहीं बन सकता।

    क्यों है फैसला अहम?
    यह निर्णय उन मामलों के लिए मिसाल माना जा रहा है, जहां धर्म या सामाजिक बाधाओं के कारण गोद लेने की प्रक्रिया अटक जाती है। अदालत ने साफ किया कि कानूनी प्रक्रिया में सबसे ऊपर बच्चे का कल्याण ही होना चाहिए, न कि माता-पिता का धर्म।

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