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होली के दूसरे दिन पुरुष घरों में कैद, गांव में महिलाओं का पहरा

March 05, 2026

हमीरपुर: बुंदेलखंड में होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. अबीर, गुलाल और रंगों से तर-बतर महिलाओं और पुरुषों की टोलियां जब फाग के गानों की तान छेड़ती हैं तो माहौल बेहद मनमोहक हो जाता है. हमीरपुर जिले के कुंडौरा गांव की महिलाओं की अनोखी होली सबसे प्रसिद्ध है. यहां होली में पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित होता है और होली के दिन पुरुषों को घरों में रहना पड़ता है.

यहां महिलाएं गांव के कई रास्तों पर लाठी-डंडों के साथ पहरा देती हैं और बाकी महिलाओं की टोलियां गांव में रंगों के साथ ठिठोली करती दिखाई देती हैं. अगर गांव का कोई पुरुष धोखे से भी महिलाओं के बीच पहुंच जाता है तो उसे महिलाओं के कपड़े पहनाकर नचवाया जाता है और विरोध करने पर पिटाई भी हो जाती है.

रंगों से सराबोर सैकड़ों महिलाओं का हुजूम जब होली खेलने निकलता है, तब गांव के पुरुष घरों में कैद हो जाते हैं. महिलाएं गांव में घूम-घूमकर रंग खेलती हैं. ढोलक की थाप और मजीरों की धुन पर तरह-तरह के नृत्य कर ये महिलाएं होली के हुड़दंग का पूरा आनंद उठाती हैं. साल भर घूंघट में रहने वाली महिलाएं होली के दिन अपनी हुकूमत चलाती हैं.


  • अगर किसी पुरुष ने इन महिलाओं की होली को देखने की कोशिश की या गांव से गुजर रही महिलाओं की टोली के सामने आने की जुर्रत की, तो उसकी दुर्दशा होना तय है. अगर कोई पुरुष इनके बीच फंस जाता है तो उसे भी लहंगा-चोली पहनाकर जबरन नचाया जाता है. इसी डर के चलते होली के दिन पुरुष घरों में रहते हैं और महिलाएं बाहर होली के हुड़दंग का मजा लेती हैं.

    जिले के कुंडौरा गांव में महिलाओं की होली का इतिहास लगभग 500 साल पुराना बताया जाता है. गांव की बहुएं और बेटियां भी फाग निकालने के दौरान नृत्य करती हैं, जिसे गांव का कोई पुरुष देख नहीं सकता. यदि किसी ने देखने की हिम्मत भी की तो उसे लट्ठ लेकर गांव से खदेड़ दिया जाता है. यहां महिलाओं की फाग निकालने की कोई फोटो या वीडियो भी नहीं बना सकता. यदि कोई इस अनूठी परंपरा का चोरी-छिपे फोटो लेते पकड़ा गया तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता है और महिलाएं उसकी पिटाई भी कर देती हैं.

    गांव की बुजुर्ग महिला सीता देवी के मुताबिक, कई पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है. साल में एक बार होली के दिन ही यहां महिलाओं को घर और घूंघट से बाहर निकलकर खुलकर उत्सव मनाने का मौका मिलता है.

    सालों से यहां की परंपरा है कि होली के दूसरे दिन पूरे गांव की महिलाएं और लड़कियां एकजुट होकर होली खेलती हैं. उनकी टोलियां पूरे गांव में घूमती हैं. इस दिन पूरे गांव के पुरुषों को घरों में ही रहना पड़ता है. गांव के मुख्य मार्गों पर भी महिलाएं मौजूद रहती हैं, जो किसी भी पुरुष के बाहर निकलते ही उसे रंगों से सराबोर कर देती हैं और मजाक में परेशान करती हैं. कई बार महिलाएं उन्हें अपने बीच नृत्य करने के लिए भी मजबूर कर देती हैं. गांव के पूर्व ग्राम प्रधान अवधेश के मुताबिक, वे इस प्राचीन परंपरा को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं और कई बार महिलाओं के दंड का शिकार भी हो चुके हैं.

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