
नई दिल्ली। हाल ही में सोशल मीडिया (Social Media) पर भारतीय सैन्य अधिकारियों (Indian Military Officers) के कई फोटो और वीडियो (Photos and Videos) वायरल हुए, जिनमें डीपफेक तकनीक (Deepfake Technology) का इस्तेमाल कर अधिकारियों को ऐसे बयान देते दिखाया गया, जिससे जनता के बीच भ्रम, असंतोष और संस्थाओं पर अविश्वास पैदा हो। खुफिया जांच में सामने आया कि पाकिस्तानी सेना (Pakistan Army) की मीडिया इकाई डीजी-आईएसपीआर ने अत्याधुनिक डिजिटल प्रोपेगेंडा तंत्र शुरू किया है।
अमर उजाला के पास पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के संरक्षण में चलने वाले गिरोह के प्रमुख सदस्यों के नाम, मोबाइल नंबर, फोटो, पते और कार्यप्रणाली का पूरा ब्यौरा है। इन सदस्यों में नूर अब्बास मिर्जा, हफसा मलिक, मोहसिन अली, जुनैद मुख्तार, वालिद चौधरी और शहीर हैदर शामिल हैं।
बद्री 313 साइबर फोर्स और डिजिटल दमन
पाकिस्तानी खुफिया तंत्र के संरक्षण में बद्री 313 साइबर फोर्स नाम का नेटवर्क भी काम कर रहा है। यह नेटवर्क पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की आलोचना करने वाले पत्रकारों, राजनीतिक टिप्पणीकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बनाता है। विदेशों में भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने के साथ ही पाकिस्तान में असंतोष और आलोचना वाली आवाजों को दबाया जाता है।
सूत्रों के अनुसार, यह ऑपरेटिव फर्जी क्लिक और बॉट कमेंट जोड़कर लक्षित अकाउंट के व्यू बढ़ाते हैं। इससे सोशल मीडिया साइट का मॉडरेशन अकाउंट को फर्जी मानकर उसे ब्लॉक कर देता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बद्री 313 की इसी रणनीति के चलते 29 यूट्यूब वीडियो, 3 वेबसाइटें, 6 इंस्टाग्राम हैंडल, 141 एक्स थ्रेड और 10 फेसबुक पोस्ट स्वतः रिपोर्ट और ब्लॉक हो गई थीं।
ईरानी युद्धपोत पर फैलाया भ्रम
हाल ही में एक डीपफेक वीडियो में सेना प्रमुख जनरल द्विवेदी को यह कहते दिखाया गया कि ईरान के युद्धपोत की मौजूदगी की सूचना भारत ने इस्राइल को दी थी। पीआईबी फैक्ट चेक यूनिट ने इसे फर्जी बताया, लेकिन ईरानी मीडिया ने इसे सच मानकर प्रकाशित कर दिया।
डीपफेक और सोशल मीडिया रणनीति
फर्जी वीडियो बनाने की प्रक्रिया में तीन मुख्य चरण होते हैं। पहला चरण कंटेंट सोर्सिंग है, जिसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के सार्वजनिक भाषण, इंटरव्यू और प्रेस ब्रीफिंग इकट्ठा किए जाते हैं। दूसरा चरण एडिटिंग और मैनिपुलेशन का होता है, जिसमें डीपफेक और वॉइस क्लोनिंग टूल का इस्तेमाल किया जाता है। इससे अधिकारी की आवाज और हावभाव वास्तविक लगती हैं। तीसरा चरण एम्प्लीफिकेशन है, जिसमें फर्जी वीडियो को सैकड़ों सोशल मीडिया अकाउंट और हैंडल पर एक साथ शेयर किया जाता है।
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