नई दिल्ली। देश के वरिष्ठ विधि अधिकारी रहे तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने अपनी नई किताब में न्यायपालिका (Judiciary) के कामकाज को लेकर कई असहज सवाल उठाए हैं। अपनी पुस्तक (The Bench, the Bar and the Bizarre) में उन्होंने अदालतों के भीतर मौजूद उस संस्कृति की आलोचना की है, जहां अत्यधिक औपचारिक सम्मान कुछ जजों में ‘देवत्व’ की भावना पैदा कर देता है।
मेहता का कहना है कि वकीलों द्वारा दिखाया जाने वाला अत्यधिक आदर कई बार कुछ न्यायाधीशों को “अतिशक्तिशाली” बना देता है, जिसके चलते वे कोर्टरूम में दबंग रवैया अपनाने लगते हैं। उनके मुताबिक, यह स्थिति कई रूपों में सामने आती है-जैसे दलीलों के दौरान बार-बार टोकना, अनावश्यक सख्ती या वकीलों के साथ अपमानजनक व्यवहार।
‘मिलॉर्ड’ संस्कृति पर सवाल
किताब में अदालतों की पारंपरिक भाषा पर भी कटाक्ष किया गया है। मेहता लिखते हैं कि वकीलों को स्पष्ट असहमति होने पर भी झुककर ‘मिलॉर्ड’ कहना पड़ता है और सीधे तौर पर जज की बात को गलत कहना संभव नहीं होता। इससे कोर्ट में संवाद का संतुलन प्रभावित होता है।
जजों की चुनौतियां भी स्वीकार
हालांकि, उन्होंने जजों की कठिन परिस्थितियों को भी स्वीकार किया। मेहता के मुताबिक, अदालतों में लंबित मामलों का भारी बोझ, सीमित संसाधन और अव्यवस्थित माहौल जजों के लिए बड़ी चुनौती है। खासकर निचली अदालतों में काम का दबाव और वेतन संरचना भी चिंता का विषय है।
लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि ये परिस्थितियां अदालत में अनुचित व्यवहार का औचित्य नहीं बन सकतीं। उनके अनुसार, न्यायपालिका का सम्मान आदेश से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, संयम और गरिमापूर्ण व्यवहार से अर्जित होना चाहिए।
वकीलों की सीमित विकल्पों वाली स्थिति
किताब में वकीलों की दुविधा का भी जिक्र है। अगर कोई जज अभद्र व्यवहार करता है, तो वकील के पास सीमित विकल्प होते हैं-विरोध करने पर मुवक्किल के हित और अपने पेशेवर भविष्य पर असर पड़ सकता है।
मेहता की यह किताब न्यायपालिका के भीतर मौजूद जटिलताओं और सुधार की जरूरत पर बहस को नया आयाम देती है।
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