
देश जनतंत्र से चलता है… लेकिन जब जन बिखरने लग जाए और तंत्र अड़ जाए तो देश हिल जाता है… यही नजारा देश ने पहली बार तब देखा, जब पूरे देश के युवा बिना किसी नेतृत्व के सडक़ों पर उतर आए… सरकार के विरोध में नारे लगाए और एक ऐसी जिद पर अड़े नजर आए, जिसे सरकार ने ठुकराया… एक मंत्री के इस्तीफे को अपनी नाक का बाल बनाया और यह कहकर ठुकराया कि हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं लिए जाते हैं… सरकार यह समझ ही नहीं पाई कि बात इस्तीफे की नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी से जूझते उन छात्रों की है, जो मौत को गले लगा रहे हैं… परीक्षाओं से संघर्ष करते नजर आ रहे हैं… नाकामी और मानसिक अवसाद में जीवन जला रहे हैं और आप उनसे नजरें फिरा रहे हैं… जब दावानल फटने लगा… आक्रोश भडक़ने लगा… लाठियां नाकाम हो गईं, तब एहसान का मरहम लगाती सरकार ने शैक्षणिक व्यवस्थाओं को सुधारने और अपराधियों को कड़ी सजा दिलाने का वादा किया, लेकिन छात्र तो मंत्री को अपराधी मानकर सजा नहीं केवल इस्तीफे की गुहार लगा रहे थे… यदि उनके मन के आक्रोश पर पहले ही दिन पानी डाल दिया होता, मंत्री को हटा दिया होता तो दावानल दफन हो जाता… वैसे भी मंत्रियों के इस्तीफे इतने अहम नहीं होते कि उसके लिए पूरे देश से पंगा ले लिया जाए… जबकि लोकतंत्र की पहली शर्त यह होती है कि जनता उंगली उठाए उससे पहले नेता पद छोडक़र खड़ा हो जाए… और भारतीय जनता पार्टी की सरकार तो रामराज का दावा करती है, जहां केवल धोबी के आरोप लगाने पर भगवान राम माता सीता का त्याग कर जाते हैं… फिर यह तो मात्र कुर्सी है, जिसे ठुकराना नैतिकता का तकाजा रहा है… जिस कांग्रेस की सरकार पर आपातकाल की तानाशाही का आरोप लगाया जाता है, उन्हीं की सरकार में मंत्रियों के इस्तीफों के किस्से भरे पड़े हैं…राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में सरकारी दूरदर्शन के पत्रकार विनोद दुआ ने जब मंत्री चंदूलाल चंद्राकर से साक्षात्कार में उनके विभाग की जानकारी मांगी और नहीं देने पर लाइव कार्यक्रम में उनकी हंसी भी उड़ाई तो राजीव गांधी ने विनोद दुआ पर कार्रवाई के बजाय यह कहकर मंत्री चंदूलाल चंद्राकर से इस्तीफा ले लिया कि जो मंत्री अपने विभाग के प्रति जिम्मेदार नहीं है, वो पद के काबिल नहीं है… नागरिक उड्डयन मंत्री माधवराव सिंधिया ने एक विमान दुर्घटना के बाद नैतिकता के नाते इस्तीफा दे दिया और प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने उसे स्वीकार कर लिया, जबकि विमान कोई मंत्री नहीं उड़ाता… इतना ही नहीं मुंबई बमकांड के समय तो गृहमंत्री शिवराज पाटिल का इस्तीफा सिर्फ इसलिए ले लिया गया कि वो इतनी बड़ी घटना के वक्त सूट बदलने में लगे थे… इसी तरह हरिदेव जोशी और नटवरसिंह जैसे कई नेताओं के इस्तीफे लिए गए, ताकि जनता में सत्ता के लिए विश्वास बना रहे… मोदीजी को भी चाहिए था कि वो इसे अपनी नहीं जनता की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते और इस्तीफा लेकर आग को ठंडा कर डालते, लेकिन प्रधानमंत्री के निर्णय की देरी ने सरकार ही नहीं, बल्कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इतना दोषी बना दिया कि उन्हें अपने चुनावी क्षेत्र से ही चुनाव जीतने में परेशानी आएगी… युवाओं के सवालों की नोंक उन्हें दर्द का एहसास कराएगी…
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