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इस शातिर चोर ने बनाया चोरी में वर्ल्ड रिकॉर्ड! गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम, जानिए क्‍या है पूरा मामला?

May 04, 2026

नई दिल्‍ली । कहते हैं कि रिकॉर्ड तोड़ने के लिए ही बनते हैं, लेकिन कोई इस हद तक भी जा सकता है, यह सुनकर आप अपना सिर पकड़ लेंगे. मीडिया में इन दिनों एक ऐसी खबर वायरल हो रही है, जिसने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness World Records) की सूची में एक नया और बेहद अजीब अध्याय जोड़ दिया है. दुनिया को उसका पहला ऐसा चोर मिल गया है, जिसने अपने ‘काम’ (चोरी) के लिए बाकायदा वर्ल्ड रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट हासिल किया है. इस चोर (Thief) ने अपनी ‘प्रोफेशनल’ चोरी के जरिए इतिहास रच दिया है. हालांकि, यह रिकॉर्ड बहादुरी का नहीं, बल्कि पुलिस की नाक में दम करने और सबसे ज्यादा बार या सबसे अनोखे तरीके से वारदात को अंजाम देने के लिए है.

268 लाइब्रेरी से गायब हो गईं हजारों किताबें
किताबें ज्ञान का खजाना मानी जाती हैं, लेकिन अगर कोई इन्हें ही चोरी करने लगे तो? अमेरिका के स्टीफन ब्लमबर्ग की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1970 के दशक से लेकर 1990 तक ब्लमबर्ग ने उत्तरी अमेरिका की 268 लाइब्रेरी को निशाना बनाया. इस दौरान उसने करीब 23,600 दुर्लभ किताबें चुरा लीं. इन किताबों का कुल वजन करीब 19 टन बताया जाता है.

चोरी कर बना दिया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
स्टीफन ब्लमबर्ग ने इतनी किताबें चुराईं कि उनकी इस किताबों की चोरी को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी मान्यता दी है. हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर चोरी होने के बावजूद लंबे समय तक किसी को इस पूरे खेल का अंदाजा तक नहीं हुआ. जुलाई 1991 में ब्लमबर्ग को चोरी की संपत्ति रखने के चार मामलों में दोषी ठहराया गया, जिसके बाद किताबों की चोरी के इस मामले का अंत हो गया.


  • खुद को समझता था ‘मिशन पर निकला इंसान’
    ब्लमबर्ग कोई आम चोर नहीं था. कम उम्र में ही उसे मानसिक समस्या हो गई थी और वह खुद को एक मिशन पर मानता था. उसे लगता था कि आधुनिक संस्थान और लाइब्रेरी इन दुर्लभ किताबों की सही देखभाल नहीं कर पा रहे हैं. उसके अनुसार, वह इन किताबों को ‘बचाने’ का काम कर रहा था. यही सोच उसे लगातार चोरी करने के लिए प्रेरित करती रही.

    चोरी का तरीका भी था बेहद अनोखा
    ब्लमबर्ग बेहद चालाकी से काम करता था. वह पहले दिन में लाइब्रेरी जाता, वहां का नक्शा समझता और कीमती किताबों की पहचान करता. इसके लिए वह नकली या चोरी किए गए पहचान पत्रों का इस्तेमाल करता था. इसके बाद वह रात में वापस आता और चोरी को अंजाम देता. कई बार वह तंग जगहों से घुस जाता, सुरक्षा सिस्टम को चकमा देता और बिना कोई निशान छोड़े निकल जाता.

    घुमंतू जिंदगी, लेकिन मिशन जारी
    ब्लमबर्ग का कोई स्थायी ठिकाना नहीं था. वह एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहता था. अपनी जरूरतों के लिए वह पुरानी वास्तुकला से जुड़ी चीजें बेचता था, खासकर 19वीं सदी के रंगीन कांच के सामान. इसके अलावा उसे सालाना ट्रस्ट फंड से भी पैसे मिलते थे. दिलचस्प बात यह है कि उसके पास पैसे होने के बावजूद उसने कभी किताबें खरीदी नहीं, बल्कि चोरी को ही अपना रास्ता बनाया.

    एक साथी ने खोला पूरा राज
    ब्लमबर्ग का यह खेल सालों तक चलता रहा, लेकिन आखिरकार उसका राज खुल गया. उसके ही एक पुराने साथी केनेथ रोड्स ने पुलिस को इसकी जानकारी दी. उसने चोरी से जुड़े सबूत एफबीआई को सौंपे और पूरे मामले का खुलासा कर दिया. बताया जाता है कि उसने इसके बदले पैसे भी लिए और गवाही देने का वादा किया.

    1991 में खत्म हुआ ‘बुक चोर’ का सफर
    जुलाई 1991 में ब्लमबर्ग को गिरफ्तार कर लिया गया. उस पर चोरी की संपत्ति रखने और उसे इधर-उधर ले जाने के आरोप लगे. कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया और इसी के साथ उसकी लंबी चोरी की कहानी का अंत हो गया. लेकिन ब्लमबर्ग का नाम आज भी दुनिया के सबसे बड़े पुस्तक चोर के रूप में जाना जाता है. उसकी तुलना 19वीं सदी के गुग्लिएल्मो लिब्री से की जाती है, जिन्होंने भी बड़ी संख्या में किताबें इकट्ठा की थीं. लेकिन ब्लमबर्ग का मामला इसलिए अलग माना जाता है, क्योंकि उसने पूरी तरह चोरी के जरिए इतना बड़ा संग्रह जुटाया.

    अपराध या जुनून?
    ब्लमबर्ग की कहानी यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या यह सिर्फ अपराध था या एक तरह का जुनून? वह खुद को किताबों का रक्षक मानता था, लेकिन उसके काम ने लाइब्रेरी और समाज को बड़ा नुकसान पहुंचाया. यह कहानी जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही सोचने पर मजबूर भी करती है. यह दिखाती है कि जब जुनून हद पार कर जाता है, तो वह गलत रास्ते पर भी ले जा सकता है.

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