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मासिक धर्म पर गांव से बेदखल होती हैं महिलाएं, यहां आज भी कायम ये प्रथा

September 12, 2026

सत्य साई: एक तरफ जहां पूरा देश डिजिटल क्रांति और आधुनिकता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साई जिले से परंपरा और अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न की बेहद दर्दनाक तस्वीर सामने आ रही है. जिले के मदाकासिरा निर्वाचन क्षेत्र अंतर्गत रोल्ला मंडल के गोल्लाहट्टी (गोल्ला/यादव समुदाय) गांवों में सदियों पुरानी एक विचित्र और अमानवीय प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है.

यहां महिलाओं को मासिक धर्म और प्रसव के दौरान गांव की सीमा से बाहर बनी बिना सुविधाओं वाली झोपड़ियों, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘मैला गुडिसेलु’ कहा जाता है, में रहने पर मजबूर किया जाता है. गोल्लाहट्टी गांवों की परंपरा के अनुसार, जब भी किसी महिला या युवती को माहवारी आती है, तो उसे तुरंत अपने घर और गांव की सीमा से दूर विशेष रूप से बनी ‘माइल हट’ (अशुद्ध झोपड़ी) में भेज दिया जाता है. महिलाओं को कम से कम 3 से 5 दिन अपने परिवार से दूर एकांत में बिताने पड़ते हैं.

माहवारी समाप्त होने और स्नान करने के बाद ही उन्हें घर में प्रवेश की इजाजत मिलती है. हद तो तब हो जाती है जब प्रसव (मलिनथा) के बाद नवजात शिशु के साथ मां को 21 दिनों से लेकर पूरे एक महीने तक गांव से बाहर इसी तरह अलग-अलग रखा जाता है.


  • छुआछूत, अलग बर्तन और देवताओं के कोप का डर

    • महिलाएं गांव के किसी भी व्यक्ति, कुएं, हैंडपंप या मंदिर को नहीं छू सकतीं.
    • उनके खाने-पीने के बर्तन और कपड़े बिल्कुल अलग रखे जाते हैं.
    • परिवार के लोग घर का बना खाना दूर से ही रखकर चले जाते हैं.

    समुदाय के लोगों का दृढ़ विश्वास है कि यदि मासिक धर्म या प्रसव के दौरान महिला गांव में रुकती है, तो उनके ग्राम देवता और कुल देवता क्रोधित हो जाएंगे. ग्रामीणों का मानना है कि इससे गांव के दुधारू मवेशी बीमार पड़ जाएंगे और फसलें बर्बाद हो जाएंगी. यदि कोई महिला या परिवार इस प्रथा का उल्लंघन करता है, तो गांव के बड़े-बुजुर्ग उस पर भारी जुर्माना लगाते हैं या समाज से बहिष्कृत करने की धमकी देते हैं.

    गांव के बाहर बनी इन कच्ची झोपड़ियों में सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है. न तो यहां रोशनी के लिए बिजली की व्यवस्था है और न ही शौचालय व साफ पानी की सुविधा. कड़ाके की ठंड, मूसलाधार बारिश के मौसम में महिलाओं को इन झोपड़ियों में तड़पना पड़ता है. इसके अलावा, आसपास झाड़ियों और जंगलों के कारण सांप, बिच्छू जैसे जहरीले जीवों का हमेशा जानलेवा खतरा मंडराता रहता है. स्कूल और कॉलेज जाने वाली बच्चियों को हर महीने अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है, जिससे उनका भविष्य भी प्रभावित हो रहा है.

    महिलाओं को इस जानलेवा कुप्रथा से बचाने और उन्हें सुरक्षित माहौल देने के लिए टीडीपी सरकार के कार्यकाल के दौरान गांवों में बुनियादी सुविधाओं (पानी, बिजली, शौचालय) से लैस पक्के ‘महिला सामुदायिक केंद्र’ बनाए गए थे. इसके अलावा, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने भी समय-समय पर अभियान चलाकर अंधविश्वास दूर करने और सैनिटरी हाइजीन के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास किया. हालांकि, इन प्रयासों से कुछ लोगों की सोच में मामूली बदलाव जरूर आया, लेकिन अधिकांश गोल्लाहट्टी गांवों में आज भी परंपरा के नाम पर महिलाओं की सेहत और सम्मान को ‘मैला गुडिसेलु’ की आड़ में दांव पर लगाया जा रहा है.

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