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इस्तीफे के बाद भी जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग संभव? संसद में रिपोर्ट पेश होने से पहले गरमाया मामला

July 06, 2026

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के पूर्व जज यशवंत वर्मा (Yashwant Verma) के खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में आ गई है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला (Lok Sabha Speaker Om Birla) ने जानकारी दी है कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाली तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा में पेश की जाएगी।

हालांकि, जस्टिस यशवंत वर्मा अप्रैल 2025 में ही अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं और सभी आधिकारिक जिम्मेदारियां, सुविधाएं और आवास भी छोड़ चुके हैं। उनकी पेंशन भी अभी तक जारी नहीं की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस्तीफे के बाद भी उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

पहले ही इस्तीफा, फिर भी कानूनी सवाल कायम
सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने ही उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद जांच समिति गठित की गई थी। हालांकि अब स्थिति यह है कि वे न्यायिक पद पर नहीं हैं और बार काउंसिल में नामांकन कर निजी प्रैक्टिस भी शुरू कर चुके हैं। इसी वजह से यह बहस तेज हो गई है कि महाभियोग का उद्देश्य किसी जज को पद से हटाना होता है, लेकिन जब व्यक्ति पहले ही पद छोड़ चुका हो, तो क्या यह प्रक्रिया आगे जारी रह सकती है।

संसद में प्रक्रिया और पिछली मिसालें
जुलाई 2025 में उनके खिलाफ दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लोकसभा में इसे स्वीकार करते हुए जांच समिति बनाई गई, जबकि राज्यसभा में यह प्रस्ताव गिर गया था।


  • इससे पहले भी ऐसे मामलों में प्रक्रिया अधूरी रह चुकी है। वर्ष 2011 में जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के मामले में इस्तीफा के बाद महाभियोग समिति भंग कर दी गई थी। वहीं जस्टिस सौमित्र सेन के मामले में उन्होंने राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई थी।

    कानूनी स्थिति को लेकर असमंजस
    संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला कानूनी रूप से जटिल है। कुछ व्याख्याओं में कहा गया है कि हाई कोर्ट जज का इस्तीफा राष्ट्रपति को संबोधित होते ही प्रभावी माना जाता है, जबकि अन्य सरकारी पदों में इसे स्वीकार करना आवश्यक होता है। संविधान के अनुच्छेद 217 और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार, जज एक संवैधानिक पदाधिकारी होते हैं, न कि सामान्य सरकारी कर्मचारी। इसलिए उनका इस्तीफा एकतरफा प्रभावी माना जाता है।

    भ्रष्टाचार के आरोप और आगे की कार्रवाई
    पिछले वर्ष मार्च में उनके आवास पर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने का मामला सामने आया था। हालांकि जस्टिस वर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपनी छवि खराब करने की साजिश बताया था। अब संसद में जांच रिपोर्ट पेश होने के बाद यह देखना अहम होगा कि क्या महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ती है या इसे समाप्त माना जाएगा। इस मामले ने एक बार फिर न्यायिक जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया पर बहस तेज कर दी है।

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