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Manyavar ‘Kanyadaan’ ad पर घिरीं आलिया भट्ट, जानिए हिंदू धर्म में इस परंपरा का महत्व

नई दिल्ली। मान्यवर (Manyavar) के कन्यादान (‘Kanyadaan’) ऐड को लेकर बॉलीवुड की क्यूट एक्ट्रेस आलिया भट्ट विवादों में घिर चुकी हैं. कपड़ों के ब्रैंड मान्यवर के जिस विज्ञापन में कन्यादान की जगह अब कन्यामान (KanyaMaan) की बात कही गई है। उसे लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश दिख रहा है।

ट्विटर पर मान्यवर का बहिष्कार करने का अभियान छिड़ गया है. इस विज्ञापन में आलिया भट्ट को दुल्हन के रूप में तैयार किया गया है और कन्यादान की परंपरा पर सवाल उठाया गया है। इस विज्ञापन में आलिया भट्ट सवाल करती हैं कि मैं क्या कोई दान की चीज हूं? बता दें हिंदू संस्कृति में कन्यादान को सबसे बड़ा दान माना जाता है। आइये बताते हैं कन्यादान की परंपरा और इसके महत्व के बारे में…

अहम होता है विवाह संस्कार
हिंदू धर्म की नींव 16 प्रमुख संस्कारों पर टिकी हुई है. इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण विवाह संस्कार भी है. इस संस्कार में कई रस्में होती हैं, जिसके बाद वर और वधु सात जन्म के बंधन में बंध जाते हैं. विवाह संस्कार में सबसे महत्वपूर्ण रस्म कन्यादान अर्थात कन्या (बेटी) का दान होती है. कहा जाता है कि जब बेटी का पिता कन्यादान करता है तो इसके बाद लड़की के जीवन से जुड़ी सारी जिम्मेदारियां दूल्हे (लड़के) को निभानी होती हैं।

ये है मान्यता
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार विवाह संस्कार में दूल्हे को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है. जब कन्या का पिता धार्मिक रीति रिवाजों का पालन करते हुए अपनी कन्या का हाथ वर के हाथों में सौंपता है, तो वर कन्या के पिता को आश्वासन देता है कि वो उनकी बेटी का पूरा ख्याल रखेगा. उनकी बेटी की सभी जिम्मेदारियां उठाएगा. इस संस्कार को ही कन्यादान कहते हैं. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार कन्यादान को महादान माना गया है. सीधे शब्दों में समझें तो इससे बड़ा कोई दान नहीं हो सकता. कन्यादान के बिना विवाह संपन्न नहीं माना जाता है।

कन्या को कहा गया रत्न
ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र ने बताया कि कन्यादान की परंपरा करीब 7 हजार साल पुरानी है, जिसका वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है. मान्यवर के विज्ञापन में आलिया भट्ट ये कहते दिखाई गई हैं, कि कन्या कोई चीज नहीं, लेकिन यहां उनकी भावना गलत है, पर प्राचीन युग की बात की जाए, तो वहां भावनाएं नेक और पुण्य थीं. सीता जन्म की कथा तो सभी जानते ही हैं. राज्य में अकाल पड़ने पर राजा जनक ने खेत में बारिश होने के लिए हल चलाया था, उसी दौरान जमीन के भीतर से उन्हें सीता जी मिलीं. जमीन के भीतर से तो सिर्फ रत्न सोना-चांदी, हीरा आदि ही मिलते हैं, इसलिए एक कन्या के धरती से मिलने पर उसे कन्या रत्न कहा गया।

यहां है वर्णन
श्रीरामचरित मानस में इसका पूरा वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि सीता जी के विवाह के दौरान राजा जनक भावुक हो गए. तुलसीदास ने श्रीरामचरित मानस ने इस प्रसंग को बड़े ही सजीव तरीके से चौपाई के जरिये समझाया है. ये लिखा है तुलसीदास ने….

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुं दिसि चली॥
बर कुअंरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनंद भरैं॥
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥

सरल भाषा में समझें तो इसका अर्थ है कि जनकराज श्री रामजी के चरण कमलों को प्रेम से पखारने लगे. इस दौरान आकाश नगाड़ों की धुन से गूंज उठा. इसके बाद दोनों कुलों के गुरुओं ने वर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर मंत्र पढ़े. पाणिग्रहण होता देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनंद में भर गए. इसके बाद राजा जनक ने भाव विभोर होकर कहा कि जैसे राजा हिमवान ने शिवजी को पार्वती सौंपी और सागर ने भगवान विष्णु को लक्ष्मीजी दे दी थीं. वैसे ही मैं जनक श्री रामचन्द्र को सीताजी को समर्पित कर रहा हूं. राजा जनक ने इसे कन्या दान कहा, क्योंकि उनके मन में धरती से मिलने वाले कन्या रत्न की बात थी।

समुद्र मंथन से जुड़ी है कथा
राजा जनक ने कन्या दान के पीछे का औचित्य भी समझाया. उन्होंने बताया कि जैसे सागर ने श्रीहरि विष्णु को कन्यादान किया था, वैसे ही मैं भी कर रहा हूं. कथा के अनुसार समुद्र मंथन से 14 रत्न प्राप्त हुए. इसमें से आठवां रत्न लक्ष्मी जी खुद थीं. समुद्र ने कौस्तुभ मणि के साथ उनका दान विष्णुजी को कर दिया था. तब लक्ष्मी-नारायण का दोबारा विवाह हुआ. ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र ने बताया कि हर पिता अपनी बेटी को सीता और लक्ष्मी के समान देखते हैं. उन्हें रत्न कहते हैं तो इसके पीछे की मंशा बेटियों को वस्तु समझने की नहीं है, बल्कि उस सम्मान की बात है जो बेटियों को देवी के तौर पर देखता है।

होती है मोक्ष की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो पिता अपनी बेटी का कन्यादान करता है उसे परिवार सहित स्वर्ग की प्राप्ति होती है और वह भवसागर के बंधनों से तर जाता है. जिन माता-पिता को कन्यादान करने का मौका प्राप्त होता है, वो काफी सौभग्यशाली होते हैं. ऐसा माना गया है कि जो माता-पिता कन्यादान करते हैं, उनके लिए इससे बड़ा पुण्‍य कुछ नहीं है. यह दान उनके लिए मोक्ष की प्राप्ति यानि मरणोपरांत स्‍वर्ग का रास्‍ता भी खोल देता है।

इस तरह शुरू हुई ये परंपरा
पौराणिक कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के बाद कन्यादान किया था. 27 नक्षत्रों को प्रजापति की पुत्री कहा गया है, जिनका विवाह चंद्रमा से हुआ था. इन्होंने ही सबसे पहले अपनी कन्याओं को चंद्रमा को सौंपा था, ताकि सृष्टि का संचालन आगे बढ़े और संस्कृति का विकास हो।

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