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ऊंची बोली स्वत: आवंटन का अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से योजना 140 के 98 भूखंडों की बिक्रीका रास्ता साफ, अब 500 करोड़ ज्यादा होगी कमाई

October 15, 2026

अग्निबाण इम्पैक्ट… प्राधिकरण को हाईकोर्ट आदेश और एजी के अभिमत से हो जाता बड़ा नुकसान, तथ्य परख खबरों के चलते करना पड़ी सुप्रीम कोर्ट में अपील और जीत भी मिल गई 

इस तरह समझें सुप्रीम कोर्ट के 14 पेजी महत्वपूर्ण आदेश को

ठ्ठ टेंडर भर देने से ही अधिकार सृजित नहीं हो जाता

– ना आवंटन-पत्र जारी हुआ और ना ही आरंभिक राशि जमा की

– ४ हफ्ते में प्राधिकरण बोर्ड को लेना पड़ेगा निर्णय

– इंदौर हाईकोर्ट के साथ एजी का अभिमत भी किया खारिज

– २ साल पहले ९७ भूखंडों के टेंडर निरस्त कर चुका है बोर्ड

– विधिक अभिमत की पोल खोली अग्निबाण ने, सुप्रीम कोर्ट में भी धराशायी

– ८ साल पहले प्राधिकरण ने बुलवाए थे भूखंडों के टेंडर

 

इंदौर, राजेश ज्वेल। अग्निबाण द्वारा प्रकाशित तथ्यात्मक खबरों की एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट तक पुष्टि हो गई… इंदौर विकास प्राधिकरण को भी एक बार फिर इन खबरों से सैंकड़ों करोड़ का लाभ होगा। प्राधिकरण की चर्चित और महंगी योजना 140 के 98 भूखंडों की बिक्री का रास्ता अब साफ हो गया है। इंदौर हाईकोर्ट के दो आदेशों के साथ एड्वोकेट जनरल द्वारा दिए गए विवादित विधिक अभिमत को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए 14 पेज का महत्वपूर्ण आदेश दिया है, जिसके चलते 8 साल पुरानी दरों पर भूखंडों के आबंटन का खेल भी चौपट हो गया। वर्तमान में इन भूखंडों की कीमत बुलाए गए टेंडरों में प्राप्त राशि से दो गुना से अधिक हो गई है। अब सुप्रीम कोर्ट आदेश के मद्देनजर 4 हफ्ते में प्राधिकरण बोर्ड याचिकाकर्ता के भूखंड पर फैसला करेगा, जिसकी पूर्व में ही बोर्ड अन्य सभी 97 भूखंडों के टेंडरों को निरस्त करने का निर्णय ले चुका है।

प्राधिकरण की कई योजनाओं में होने वाले जमीनों के खेल को समय-समय पर अग्रिबाण ने उजागर किया, जिनमें गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनें भी शामिल रही, जिसके चलते प्राधिकरण को हजारों करोड़ रुपए का फायदा भी हुआ है और ताजा मामला योजना 140 से जुड़ा है। इस मामले में तथ्य यह है कि प्राधिकरण ने 2018 में विभिन्न भूखंडों के आबंटन के लिए टेंडर जारी किए थे, जिसमें भूखंड क्रमांक 7-सीबी के लिए आयुष गर्ग ने भी टेंडर भरा और आरक्षित मूल्य 69 हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर से बढ़ाकर 1 लाख 20 हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर दी गई। साथ ही प्राधिकरण ने अन्य 97 भूखंडों के भी उसी वक्त टेंडर साथ में जारी किए थे, लेकिन हाईकोर्ट से मिले स्टे के चलते प्राधिकरण ने इन टेंडरों को खोला ही नहीं और ना ही इनके साथ टेंडर फॉर्म की शर्तों के मुताबिक मांगी गई राशि के बैंक ड्रॉफ्ट इस्तेमाल भी नहीं किए। 4 साल बाद 2022 में हाईकोर्ट ने रीट अपील का निराकरण किया और उसके बाद आयुष गर्ग ने आबंटन-पत्र जारी करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर 2024 में प्राधिकरण को मूल्य निर्धारण समिति गठित करने और चार हफ्ते में फैसला करने के निर्देश दिए। इसके बाद प्राधिकरण की समीक्षा याचिका भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। नतीजतन प्राधिकरण ने एडव्होकेट जनरल से भी अभिमत लिया, जिसमें भूखंड आबंटन कर देने की अनुशंसा कर दी गई। इस विधिक अभिमत से 3 साल पहले ही प्राधिकरण को लगभग 300 करोड़ का घाटा होना था, जिसका बेबाकी से खुलासा अग्रिबाण ने किया। नतीजतन प्राधिकरण को सुप्रीम कोर्ट में अपील करना पड़ी और अभी पिछले हफ्ते डेढ़ से दो घंटे तक सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस के बाद प्राधिकरण के पक्ष में फैसला दिया गया और कल शाम को ही यह 14 पेज का महत्वपूर्ण आदेश सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हुआ, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऊंचीबोली लगा देने से ही स्वत: आबंटन का अधिकार नहीं मिल जाता और इस पर अंतिम निर्णय लेने के बोर्ड को पूरे अधिकार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हाईकोर्ट के दोनों आदेशों और एड्वोकेट जनरल के अभिमत को ही खारिज कर दिया और चार हफ्ते में बोर्ड को निर्णय लेने को कहा और इसकी जानकारी बोलीदाता आयुष गर्ग को भी देने को कहा।

इस मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि प्राधिकरण बोर्ड शेष 97 भूखंडों के टेंडर भी निरस्त कर चुका है, जिसे हालांकि कई टेंडरदाताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है। मगर चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है, जिसके चलते अब हाईकोर्ट से भी राहत मिल ही जाएगी और उसके बाद इन 98 भूखंडों को प्राधिकरण वर्तमान गाइडलाइन और बाजार दर के मुताबिक टेंडर के जरिए बेचेगा, जिससे उसे 500 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का अतिरिक्त मुनाफा होगा, क्योंकि इन भूखंडों को अगर 8 साल पुरानी दरों पर बेचा जाता तो तगड़ा घाटा होता, क्योंकि इस बीच इन भूखंडों की कीमत दो से तीन गुना तक बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि मूल्य निर्धारण समिति के गठन का भी कोई प्रावधान नियमों में नहीं है। प्राधिकरण विरुद्ध आयुष गर्ग के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकरण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ मिश्रा ने पैरवी की और उनका सहयोग प्राधिकरण के अभिभाषक अम्बर पारे ने किया। इस प्रकरण में प्राधिकरण सीईओ डॉ. परीक्षित झाड़े की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने तमाम दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट को उपलब्ध करवाए। यह भी उल्लेखनीय है कि जब से श्री पारे प्राधिकरण का पक्ष हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रखवा रहे हैं तब से अधिकांश ही प्रकरणों में प्राधिकरण को जीत मिली है। प्राधिकरण के विधिक अधिकारी मनीष श्रीवास्तव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इस तरह के मामलों में नजीर बनेगा, जिससे यह भी स्पष्ट हो गया कि प्राधिकरण को बुलाए गए टेंडरों को निरस्त करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।

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