
जबलपुर। शहर में जमीन का खेल अब अंडरग्राउंड नहीं, खुलेआम सड़कों पर खेला जा रहा है। रिंग रोड, बायपास और शहर से लगे इलाकों में अवैध कॉलोनियों की बाढ़ आ चुकी है और सिस्टम? या तो सो रहा है, या फिर सब कुछ देखकर भी ‘अनदेखा’ कर रहा है। अमखेरा रोड से कटंगी बायपास, बरेला, गोराबाजार से पनागर तक खेतों को रातों-रात प्लॉट में बदला जा रहा है। पाटन रोड के तिमरी गांव में एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों अवैध कॉलोनियां खड़ी हो गईंज् लेकिन न तहसील हिली, न जिला प्रशासन। सवाल उठता है—क्या ये सब बिना सेटिंग के संभव है?
ग्रीन बेल्ट भी ‘बिकाऊ’
पनागर के भरदा गांव में खेतों को पाटकर ‘बालाजी सिटीÓ बस रही है। नियमों को ठेंगा दिखाकर सैकड़ों प्लॉट बेच दिए गए। न रेरा, न टीएनसीपी फिर भी कारोबार फुल स्पीड में। जिम्मेदार अफसरों की कुर्सियां हिलती क्यों नहीं?
सोशल मीडिया पर सपने, जमीनी हकीकत में धोखा
टेली कॉलिंग और सोशल मीडिया के जरिए ‘ड्रीम प्लॉटÓ बेचे जा रहे हैं। लेकिन हकीकत—न सड़क, न पानी, न बिजली। लोग अपनी जिंदगी की कमाई लगाकर अब बुनियादी सुविधाओं के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
जनता लूटी, सिस्टम चुप क्यों?
खरीदार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों की चुप्पी हर सवाल को और गहरा कर रही है। क्या ये सिर्फ लापरवाही है या फिर पूरा सिस्टम इस खेल में शामिल है?
अब सवाल जनता का—कार्रवाई कब?
जब अवैध कॉलोनियां खुलकर बस रही हैं, लोग ठगे जा रहे हैं, और नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं—तो आखिर कार्रवाई किस दिन के लिए बचाकर रखी गई है? जबलपुर में ये सिर्फ जमीन का घोटाला नहीं, बल्कि सिस्टम की साख पर सीधा वार हैज् और जवाब अभी तक गायब है।
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