ब्‍लॉगर

समुद्र के लिए संकट बने मास्क

– प्रमोद भार्गव

कोरोना विषाणु स्वास्थ्य के साथ-साथ अनेक तरह की समस्याएं खड़ी कर रहा है। हांगकांग की पर्यावरण सरंक्षण संस्था ‘ओसियंस एशिया’ ने इस सिलसिले में वैश्विक बाजार अनुसंधान के आधार पर एक रिपोर्ट जारी की है, जो पर्यावरण से जुड़े खतरों का बहुस्तरीय खुलासा करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार समुद्री पारस्थितिकी तंत्र सबसे ज्यादा प्रदूषित होगा। उपयोग के बाद लापरवाहीपूर्वक फेंके गए 150 करोड़ मुख-मास्क समुद्र में पहुंच रहे हैं। इस हजारों टन प्लास्टिक से समुद्री जल में फैलने वाले प्रदूषण के कारण समुद्री जीवों को जानलेवा खतरों का भी सामना करना पड़ेगा।

कोरोना से बचने के लिए बीते समय में 5200 करोड़ मास्क बने हैं। इनमें से करीब तीन प्रतिशत मास्क समुद्र में पहुंचेंगे। एकबार इस्तेमाल किए ये मास्क मेल्टब्लॉन किस्म के प्लास्टिक से बने होते हैं। इसके संरचनात्मक (कम्पोजिशन) खतरे और संक्रमण की वजह से इसे पुनर्चक्रित करना कठिन है। यह समुद्रों में तब पहुंचता है, जब यह कचरे में फेंक दिया जाता है। प्रत्येक मास्क का वजन तीन से चार ग्राम होता है। ऐसे में एक अनुमान के मुताबिक करीब 6800 टन से ज्यादा प्लास्टिक प्रदूषण समुद्र में उत्पन्न होगा। इसे प्राकृतिक रूप से नष्ट होने में करीब 450 साल लगेंगे।

नए शोधों से पता चला है कि अकेले आर्कटिक सागर में 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। एक और नए ताजा शोध से ज्ञात हुआ है कि दुनियाभर के समुद्रों में 50 प्रतिशत कचरा केवल उन कॉटन बड्स का है, जिनका उपयोग कान की सफाई के लिए किया जाता है। इन अध्ययनों से पता चला है कि 2050 आते-आते समुद्रों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक कहीं ज्यादा होगा। भारत के समुद्रीय क्षेत्रों में तो प्लास्टिक का इतना अधिक मलबा एकत्रित हो गया है कि समुद्री जीव-जंतुओं का जीवन-यापन संकट में आने लगा है। प्लास्टिक जीव जगत के लिए खतरनाक पहलू साबित हो रहा है, बावजूद प्लास्टिक इतना लाभदायी है कि इसके अपशिष्ट का समुचित प्रबंधन हो जाए तो इससे सड़कें और ईंधन तक बनाया जा सकता है। अलबत्ता प्लास्टिक के अवशेष बचते हैं तो इन्हें जीवाणुओं से नष्ट किया जा सकता है। 

साइंस एडवांसेज नामक शोध-पत्रिका में छपे एक अध्ययन में बताया है कि आर्कटिक समुद्र के बढ़ते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है। वैसे जेआर जाम बैक का दावा है कि समुद्र की तलहटी में 5 खरब प्लास्टिक के टुकड़े जमा हैं। यही वजह है कि समुद्री जल में ही नहीं मछलियों के उदर में भी ये टुकड़े पाए जाने लगे हैं। सबसे ज्यादा प्लास्टिक ग्रीनलैंड के पास स्थित समुद्र में मौजूद है। प्लास्टिक की समुद्र में भयावह उपलब्धि की चौंकाने वाली रिपोर्ट ‘यूके नेशनल रिसोर्स डिफेंस काउंसिल’ ने भी जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक वर्ष दुनिया भर के सागरों में 14 लाख टन प्लास्टिक विलय हो रहा है। सिर्फ इंगलैंड के ही समुद्रों में 50 लाख करोड़ प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं। प्लास्टिक के ये बारीक कण (पार्टीकल) कपास-सलाई (कॉटन-बड्स) जैसे निजी सुरक्षा उत्पादों की देन हैं। ये समुद्री सतह को वजनी बनाकर इसका तापमान बढ़ा रहे हैं। समुद्र में मौजूद इस प्रदूषण के सामाधान की दिशा में पहल करते हुए इंग्लैंड की संसद ने पूरे देश में पर्सनल केयर प्रोडक्ट के प्रयोग पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पारित किया है। इसमें खासतौर से उस कपास-सलाई का जिक्र है, जो कान की सफाई में इस्तेमाल होती है। प्लास्टिक की इस सलाई में दोनों और रूई के फोहे लगे होते हैं। इस्तेमाल के बाद फेंक दी गई यह सलाई सीवेज के जरिए समुद्र में पहुंच जाती हैं। गोया, ताजा अध्ययनों से जो जानकारी सामने आई है, उसमें दावा किया गया है कि दुनिया के समुद्रों में कुल कचरे का 50 फीसदी इन्हीं कपास-सलाईयों का है।

इंग्लैंड के अलावा न्यूजीलैंड और इटली में भी कपास-सलाई को प्रतिबंधित करने की तैयारी शुरू हो गई है। दुनिया के 38 देशों के 93 स्वयंसेवी संगठन समुद्र और अन्य जल स्रोतों में घुल रही प्लास्टिक से छुटकारे के लिए प्रयत्नशील हैं। इनके द्वारा लाई गई जागरूकता का ही प्रतिफल है कि दुनिया की 119 कंपनियों ने 448 प्रकार के व्यक्तिगत सुरक्षा उत्पादों में प्लास्टिक का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आठ यूरोपीय देशों में जॉनसन एंड जॉनसन भी कपास-सलाई की बिक्री बंद करने जा रही है।

प्रदूषण से जुड़े अध्ययन यह तो अगाह कर रहे हैं कि प्लास्टिक कबाड़ समुद्र द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है। यह हमने पैदा किया है, जो विभिन्न जल-धाराओं में बहता हुआ समुद्र में पहुंचा है। इसलिए अगर समुद्र में प्लास्टिक कम करना है तो हमें धरती पर इसका इस्तेमाल कम करना होगा। समुद्र का प्रदूषण दरअसल हमारी धरती के ही प्रदूषण का विस्तार है, किंतु यह हमारे जीवन के लिए धरती के प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।

विश्व आर्थिक संगठन के अनुसार दुनियाभर में हर साल 311 टन प्लास्टिक बनाया जा रहा है। इसमें से केवल 14 प्रतिशत प्लास्टिक को पुनर्चक्रित करना संभव हुआ है। भारत के केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय महानगरों में प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्ररण कर बिजली और ईंधन बनाने में लगा है। साथ ही प्लास्टिक के चूर्ण से शहरों और ग्रामों में सड़कें बनाने में सफलता मिल रही है। आधुनिक युग में मानव की तरक्की में प्लास्टिक ने अमूल्य योगदान दिया है। इसलिए कबाड़ के रूप में जो प्लास्टिक अपशिष्ट बचता है, उसका पुनर्चक्रण जरूरी है। क्योंकि प्लास्टिक के यौगिकों की यह खासियत है कि ये करीब 400 साल तक नष्ट नहीं होते हैं। इनमें भी प्लास्टिक की ‘पोली एथलीन टेराप्थलेट’ ऐसी किस्म है, जो इससे भी ज्यादा लंबे समय तक जैविक प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद नष्ट नहीं होती है। इसलिए प्लास्टिक का पुर्नचक्रण कर इससे नए उत्पाद बनाने और इसके बाद भी बचे रह जाने वाले अवशेषों को जीवाणुओं के जरिए नष्ट करने की जरूरत है।

यदि भारत में कचरा प्रबंधन सुनियोजित और कचरे का पुर्नचक्रण उद्योगों की श्रृंखला खड़ी करके शुरू हो जाए तो इस समस्या का निदान तो संभव होगा ही रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे। भारत में जो प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, उसमें से 40 प्रतिशत का आज भी पुर्नचक्रण नहीं हो पा रहा है। यही नालियों-सीवरों और नदी-नालों से होता हुआ समुद्र में पहुंच जाता है।

प्लास्टिक की विलक्षणता यह भी है कि इसे तकनीक के मार्फत पांच बार से भी अधिक मर्तबा पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान इससे वैक्टो ऑयल भी सह उत्पाद के रूप में निकलता है, इसे डीजल वाहनों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत अनेक देश इस कचरे से ईंधन प्राप्त कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई पायलेट रॉसेल ने तो 16 हजार 898 किमी का सफर इसी ईंधन को विमान में डालकर सफर करके विश्व-कीर्तिमान स्थापित किया है। इस यात्रा के लिए पांच टन बेकार प्लास्टिक को विशेष तकनीक द्वारा गलाकर एक हजार गैलन में तब्दील किया गया। फिर एकल इंजन वाले 172 विमान द्वारा सिडनी से आरंभ हुआ सफर एशिया, मध्य एशिया और यूरोप को नापते हुए छह दिन में लंदन पहुंचकर समाप्त हुआ। प्रतिदिन लगभग 2500 किमी का सफर 185 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से तय किया गया। भारत में भी प्लास्टिक से ईंधन बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है। किंतु अभी प्रारंभिक अवस्था में है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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