
नई दिल्ली। सरकार (Government) द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण (Women’s Reservation) से जुड़े तीनों विधेयक (Bill) लोकसभा (Lok Sabha) में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था, लेकिन यह आवश्यक आंकड़े से 54 वोट कम रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान किया, जिसमें सरकार को 352 वोट की जरूरत थी, जबकि पक्ष में केवल 298 वोट ही मिले।
वहीं, इस विधेयक के विरोध में 230 वोट पड़े। आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण यह बिल लोकसभा में गिर गया। इसके बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में आंदोलन शुरू करने की घोषणा भी की है।
संख्या के गणित में क्यों हार गई सरकार?
महिला आरक्षण से जुड़े इस संविधान संशोधन को पास कराने के लिए 352 वोट जरूरी थे, लेकिन सरकार इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी। समर्थन में 298 वोट ही जुट पाए, जिससे बिल तय सीमा से काफी पीछे रह गया। इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी दलों—कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों—को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बिल के गिरने के बाद जश्न मनाने को निंदनीय बताया।
लंबी चर्चा और अपील भी नहीं आई काम
यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में पेश किया था। इस पर गुरुवार को करीब 14 घंटे तक चर्चा चली, जो सुबह 11 बजे से देर रात एक बजे के बाद तक जारी रही। इसके बाद शुक्रवार को भी सुबह से लेकर शाम तक बहस जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष से सहयोग की अपील करते हुए इसे ‘क्रेडिट का ब्लैंक चेक’ बताया था। साथ ही वोटिंग से पहले उन्होंने सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने का आग्रह भी किया, लेकिन इसका असर नतीजों में नहीं दिखा।
विपक्ष का रुख और मुख्य आपत्ति
बहस के दौरान विपक्षी दलों ने स्पष्ट किया कि वे महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, लेकिन परिसीमन को लेकर उनकी आपत्ति है। इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए कई विपक्षी सांसदों ने बिल का विरोध किया, जिससे सरकार को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।
सत्र बढ़ाने पर भी रहा टकराव
बजट सत्र 2 अप्रैल को समाप्त होना था, लेकिन सरकार ने इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इसके लिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन से अनुरोध किया गया था कि 16 से 18 अप्रैल तक सदन की बैठक जारी रखी जाए। वहीं, विपक्ष ने सुझाव दिया था कि पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव खत्म होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और फिर संसद सत्र आयोजित किया जाए। हालांकि सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
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