नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण (women’s reservation) से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहां विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों का विरोध करने का आरोप लगा रही है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की “सोची-समझी रणनीति” बता रहा है।
क्या था पूरा मामला?
सरकार ने पांच राज्यों के चुनाव के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़े संशोधन समेत तीन अहम विधेयकों को पास कराने की कोशिश की। पहले दिन देर रात तक चर्चा चली और 17 अप्रैल को कानून लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी गई।
लेकिन शाम को जब वोटिंग हुई, तो ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’ लोकसभा में पास नहीं हो सका।
क्यों नहीं पास हो पाया विधेयक?
संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। वोटिंग में 528 सांसदों ने हिस्सा लिया, जिनमें 298 ने समर्थन किया और 230 ने विरोध। जबकि पास होने के लिए 352 वोट चाहिए थे—यानी आंकड़ा पूरा नहीं हो पाया और विधेयक गिर गया।
बीजेपी बनाम विपक्ष—किसका क्या दावा?
गहलोत ने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत पूरी सरकार को शुरुआत से स्थिति का अंदाजा था, लेकिन सर्वदलीय बैठक नहीं बुलाई गई।
विपक्ष में फूट डालने का आरोप
विपक्ष का दावा है कि सरकार ने सभी दलों को साथ लाने के बजाय अलग-अलग बातचीत कर विपक्ष में मतभेद पैदा करने की कोशिश की। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार सर्वदलीय बैठक की मांग करते रहे, लेकिन उसे नजरअंदाज किया गया।
क्या राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा चुनावी रणनीति से भी जुड़ा हो सकता है।
आगे क्या?
महिला आरक्षण का मुद्दा अब राज्यों के चुनाव से लेकर 2029 के लोकसभा चुनाव तक एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में इसकी गूंज अभी से सुनाई देने लगी है।
विधेयक का गिरना सिर्फ संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की सियासत का ट्रेलर भी माना जा रहा है—जहां “महिला आरक्षण” अब बड़ा चुनावी नैरेटिव बनने जा रहा है।
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