ब्‍लॉगर

आदिवासियों का आदि-धर्म

– प्रमोद भार्गव

आदिवासी ! कहने को तो चार अक्षरों की छोटी-सी संज्ञा है लेकिन यह शब्द देशभर में फैली अनेक आदिवासी या वनवासी नस्लों, उनके सामाजिक संस्कारों, संस्कृति और सरोकारों से जुड़ा है। इनके जितने सामुदायिक समूह हैं, उतनी ही विविधतापूर्ण जीवनशैली और संस्कृति है। हम चूंकि अभी भी इस संस्कृति के जीवनदायी मूल्यों और उल्लासमयी अठखेलियों से अपरिचित हैं, इसलिए इनका जीवन हमारे लिए अछूत और विस्मयकारी बना हुआ है।

इस संयोग के चलते ही उनके प्रति यह धारणा भी बना ली गई है कि एक तो वे केवल प्रकृति प्रेमी हैं, दूसरे वे आधुनिक सभ्यता और संस्कृति से दूर हैं। इस कारण उनके उस पक्ष को तो ज्यादा उभारा गया, जो ‘घोटुल’, ‘भगोरिया’ और ‘रोरूंग’ जैसे उन्मुक्त रीति-रिवाजों और दैहिक खुलेपन से जुड़े थे लेकिन उन मूल्यों को नहीं उभारा गया, जो प्रकृति से जुड़ी ज्ञान-परंपरा, वन्य जीवों से सह-अस्तित्व, प्रेम और पुनर्विवाह जैसे आधुनिकतम सामाजिक मूल्यों व सरोकारों से जुड़े हुए थे।

इन संदर्भों में उनका जीवन व संस्कृति से जुड़ा संसार आदर्श रहा है। इन उनमुक्त संबंधों, बहुरंगी पोशाकों, लकड़ी और वन्य जीवों के दांतों व हड्डियों से बने आभूषणों के साथ उमंग एवं उल्लास भरे लोक-गीत, संगीत तथा नृत्य से सराबोर रूमानी संसार व रीति-रीवाजों को कौतुहल तो माना किंतु कथित सभ्यता के मापदण्ड पर खरा नहीं माना। उनके सदियों से चले आ रहे पारंपरिक जीवन को आधुनिक सभ्यता की दृष्टि से पिछड़ा माना। उन्हें असभ्य माना। परिणामतः समाजशास्त्रियों को तथा मानवतावादियों को उनपर तरस आया और उन्हें ‘सभ्य’ व आधुनिक बनाने के अभियानों की होड़ लग गई। उन्हें सनातन हिंदू धर्म से अलग करने की कोशिशें इसी अभियान का हिस्सा हैं।

परतंत्र भारतीय व्यवस्था में अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भारतीय आदिवासियों के प्रति यही दोहरी और दोगली दृष्टि अपनाई। गोया उनकी जीवन और संस्कृति को बदलने के उपाय उनकी जीवन-शैली के अध्ययन के बहाने से शुरू हुए। यह अध्ययन उन्हें मानव मानकर चलने से कहीं ज्यादा, उन्हें वस्तु और वस्तु से भी इतर पुरातत्वीय वस्तु मानकर किए गए। नतीजतन आदिवासी अध्ययन और संरक्षण की सरकारी स्तर पर नई शाखाएं खुल गईं। आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों को काम के लिए उत्साहित किया गया। मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम तो किए, लेकिन सुनियोजित ढंग से धर्म परिवर्तन के अभियान भी चलाए।

इन अभियानों में बौद्धिक भारतीयों के तर्क बाधा न बनें इसलिए कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों को ‘वर्जित क्षेत्र’ घोषित करने की कोशिशें हुईं। बहाना बनाया गया कि इनकी पारंपरिक संस्कृति और ज्ञान परंपरा को सुरक्षित बनाए रखने के ये उपक्रम हैं। मिशनरियों को स्थापित करने के परिप्रेक्ष्य में तर्क दिया कि इन्हें सभ्य और शिक्षित बनाना है। किंतु ये दलीलें तब झूठी सिद्ध हो गई, जब संस्कृति और धर्म बदलने के ये कथित उपाय अंग्रेजी सत्ता को चुनौती बनने लगीं। स्वतंत्रता आंदोलन की पहली चिंगारियां इसी दमन के विरुद्ध आदिवासी क्षेत्रों में फूटीं। भील और संथाल आदिवासियों के विद्रोह इसी दमन की उपज थे। जिस 1857 को देश का सुनियोजित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसमें आहुति अनेक आदिवासी समुदायों ने दी। बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, ठक्कर बापा और गुंडाधुर जैसे आदिवासी क्रांति के नायकों को छोड़ दें तो कामोबेश आजादी की लड़ाई में इनके महत्व की भी उपेक्षा की गई है।

1857 से भी पहले ओडिशा में आदिवासी असंतोष के रूप में जो विद्रोह व्यापक रूप से फूटा था, इसे अब जाकर पहले स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिए जाने की मांग उठ रही है। अंग्रेज हुक्मरानों के विरुद्ध भारतीय नागरिकों का यह सशस्त्र संघर्ष 1857 के संग्राम से 40 साल पहले 1817 में राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बनकर उभरा था। गोया, जिस समय आजादी की लड़ाई लड़ रहा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों से सीमित स्वायत्तता की मांग कर रहा था और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना लगातार यह कहकर कि ‘हिंदू-मुसलमान तो दो अलग राष्ट्र हैं’, विभाजन की नींव को गहरी और अलगाव की खाई को चौड़ा कर रहे थे, इसके भी दो-ढाई दशक पहले बिरसा मुंडा फिरंगियों को अपने क्षेत्र से खदेड़ने की जीवटता दिखा रहे थे। एक-एक कर जब राजतंत्र फिरंगी हुक्मरानों के आगे शरणगात हो रहे थे और जो शेष सामंत प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने थे, उसके भी पहले बख्शी जगबंधु, सिद्धो कान्हू और तिलका मांझी ने सतत युद्धरत रहते हुए, अंग्रेजों को अपनी सीमाओं से बहुत दूर तक धकेल दिया था। यदि शरणागत हुए सामंत इस कठिन दौर में अंग्रेजों को अपनी सेना और रशद नहीं दिए होते तो बियावान जंगलों में अंग्रेजों के शवों की शिनाख्त भी मुश्किल थी। रामायण काल रहा हो या सामाजिक विखंडन का महाभारत युग, आदिवासी कह लें या वनवासी सभ्यता एवं संस्कृति, हमेशा सनातन भारतीय हिंदू संस्कृति की अटूट हिस्सा रही है। बावजूद इनका राष्ट्रीय योगदान के परिप्रेक्ष्य में तटस्थ मूल्यांकन कमोबेश नहीं हुआ। यही कारण है कि ये स्वतंत्रता के 73 साल बाद भी उस सामाजिक न्याय से वंचित हैं, जिसके ये वास्तव में अधिकारी हैं।

जहां तक वनवासियों के धर्म का सवाल है तो यह आदिवासी ही नहीं, वरन् समग्र मानव समुदायों में असुरक्षा की भावना, अज्ञान और अंधविश्वास मानव समाज को धर्मावलंबी व धर्मभीरु बनाते हैं। मनुष्य-जीवन में धर्म के प्रति यही भावनाएं आरंभ का बीज-मंत्र हैं। धर्म के संस्कार प्रत्येक मनुष्य में जन्म के साथ ही अवचेतन में बैठे चले जाते हैं, जो आजीवन उसे धार्मिक बनाए रखने का काम करते हैं। समस्त हिंदू जातियों की तरह आदिवासियों में भी आदि व सनातन शक्ति भगवान हैं। यही सर्वोच्च देव सृष्टि के सर्जक व पालनकर्ता माने जाते हैं। इन भगवान से पृथक इनके स्थानीय देव भी होते हैं, जो लोक-देवता कहलाते हैं। लोक-देवता स्थानीयता से अपने समय किए कर्तव्य की महिमा से भी जुड़े होते हैं। प्राकृतिक आपदा या घटना विशेष घटित होने के समय तारणहार की भूमिका चमात्कारिक ढंग से निर्वाह के कारण ये लोक-देवता कहलाने लगते हैं। रोग के निदान और धंघे में लाभ से भी इनका संबंध रहा है। किंवदंतियों और मिथकों का रूप दे दिए जाने के कारण ये लोक-देव ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ जैसी लोकप्रियता पा लेते हैं। ये देव उदात्त चरित्र, पवित्र भावना, त्याग, बलिदान और जन-सेवा जैसे बहुत से क्षेत्रों में महत्ती भूमिका का निर्वाह कर चुकने के कारण देवता स्वरूप मान लिए जाते हैं। इसीलिए आदिवासियों में जहां ईश्वर के रूप में शिव, राम, कृष्ण शीतला माता, बलारी माता, शारदा माई और हनुमान पूजे जाते हैं, वहीं लोक-देवताओं के रूप में मोती सिंह, तेजाजी, हरदौल, सिंगाजी, हीरामन, नाहर देव, कासर देव और भैरव देव को लोक में पूजे जाने की मान्यताएं हैं। ये सब धर्म का आधार होने के साथ, आस्था और विश्वास का कारण हैं। ये श्रद्धा का आश्रय हैं। लोग इनसे मनौतियां मांगते हैं। इनकी मिन्नतें पूरी भी होती हैं। राम जब वन में थे और रावण ने सीता का हरण कर लिया था, तब इन्हीं वनवासियों के सहयोग से न केवल राम ने रावण पर विजय हासिल की, बल्कि भगवान भी कहलाए।

इस दृष्टि से आदिवासी कह लें या वनवासी ये मूलतः सनातन हिंदू थे और हैं। आजादी के बाद आरएसएस ने सेवाभारती के माध्यम से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में वनवासियों के लिए एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण केंद्र, छात्रावास और वनबंधु परिषद् जैसे केंद्र आदिवासियों में शिक्षा व जागरुकता का अलख जगा रहे हैं। फिर भी खासतौर से झारखंड और ओडिसा में मिशनरियां इनके धर्मांतरण में लगी हैं। कई वामपंथी दल और बौद्धिक संगठन भी इनके हिंदू नहीं होने का दावा करते हैं। जबकि आदिवासियों को बरगलाने वाले ज्यादातर हिंदू हैं और हिंदू रीति-रिवाज व कर्म-कांडों को निष्ठा से अपनाए हुए हैं। इस कारण आदिवासियों का धर्मांतरण आसान नहीं रह गया है। साफ है, ये अपने निहित स्वार्थों के चलते आदिवासियों को उकसा रहे हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार वनवासियों की संख्या 12 करोड़ के लगभग हैं। इनके 781 समुदाय हैं, जो भिन्न रीति-रिवाजों से जुड़े हैं। लेकिन इन सबकी सांस्कृतिक पहचान सनातन हिंंदू संस्कृति के ही प्रकार हैं। इस संस्कृति से ये इतने गुंथे हुए हैं कि इनकी पहचान को अलग किया ही नहीं जा सकता है। जिन पहाड़, नदियों और पेड़ों की पूजा आदिवासी करते हैं, उनकी पूजा पूरा हिंदू समुदाय करता है। ऋग्वेद इसी प्रकृति पूजा का ग्रंथ है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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